| मीडिया विशेषज्ञ आनंद प्रधान |
आज वाराणसी के लंका स्थित स्वयंवर वाटिका में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी (सेमिनार) आयोजित की गई। यह संगोष्ठी अस्मितकुंज नामक एक साहित्यिक संस्था द्वारा आयोजित की गई थी। विषय था- ’’लोकतंत्र, मीडिया और बाज़ार’’। इस संगोष्ठी में पहली बार मोहल्ला ब्लाॅग के संस्थापक अविनाश और इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ़ मास कम्यूनिकेशन (आईआईएमसी), दिल्ली के अध्यापक रहे आनंद प्रधान को पहली बार सुनने का मौका मिला। इस संगोष्ठी में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, वाराणसी में मेरे एमए के अध्यापक रहे डाॅ0 रामाज्ञा राय ने भी अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए। इन तीनों के वक्तव्य में यह बात स्पष्ट होकर उभरी कि काॅरपरोरेट घरानों ने किस तरह से मीडिया को अपने कब्जे में कर लिया है, इसके साथ वह सत्ता पर भी कब्जा ज़माने के लिए तैयार है। डाॅ रामाज्ञा राय ने अपने वक्तव्य में कहा, ’’इस देश में जो काॅरपोरेट तंत्र आया है, उसी के गर्भ से निकली हुई पत्रकारिता आज हमारे सामने है।’’
डाॅ0 रामाज्ञा राय ने प्रमुख विद्वान नोम चेमस्की का हवाला देते हुए आगे कहा, ’’एक बार नोम चेमस्की ने कहा था कि पूँजीवाद का मीडिया से नाभिनाल संबंध है, मीडिया, पूँजीवाद और बाज़ार के पक्ष में प्रोपेगेण्डा तैयार करता है, छद्म किस्म के लोकतंत्र को बनाए रखने का काम करता है। 1990 के बाद खुले बाज़ार की जो नीति आई है उसमें बाघ और बकरी को एक साथ छोड़ दिया गया है। आज मीडिया के पास शक्ति है कि वह यह एजेंडा तय कर सकता है कि किस पर बात होगी और किस पर नहीं। आज देश में एक वैकल्पिक मीडिया आन्दोलन की ज़रूरत है। नागरिक पत्रकारिता के रूप में हमारे पास ब्लाॅग है, फेसबुक है, थियेटर है, पम्पलेट है। काॅरपोरेट आए फासिस्ट आए और लोकतंत्र भी बचा रहे, ऐसा नहीं होता। बनारस जैसे शहर में बुद्ध, कबीर और प्रेमचन्द ने फासिस्ट शक्तियों के प्रति प्रतिरोध दिखाया है। अगर यह शहर काॅरपोरेट फासिस्ट का शिकार हो जाता है तो यह बुद्ध, कबीर और प्रेमचन्द की हार होगी।’’
अविनाश ने कहा, ’’आप जब तक उनके बाज़ार भाव को बनाये रखते हैं तब तक मीडिया मालिक आपकी सहायता करते हैं। अगर आप अलग काम करना चाहते हैं तो आपके पर कतर दिए जाते हैं।’’ अविनाश ने एक संस्मरण सुनाते हुए कहा, ’’पिछले दिनों की एक घटना है वाराणसी के कंपनी बाग में अरविन्द केजरीवाल को लोगों से बातचीत करने आना था। मैं भी वहां पहुंच गया, जब मैं वहां आया तो उस समय कुछ ही लोग वहां पर उपस्थित थे। लेकिन जिस समय अरविन्द केजरीवाल वहां आएं अचानक न जाने कहाँ से बहुत से लोग आ गए और अरविन्द केजरीवाल का विरोध करने लगे, मोदी...मोदी नारा लगाने लगे। हमने टीवी पर भी कार्यक्रम को देखा उसमें सिर्फ उसी हिस्से को दिखाया जा रहा है जिसमें लोग केजरीवाल का विरोध कर रहे हैं और मोदी मोदी चिल्ला रहे हैं। केजरीवाल के लोगों के साथ संवाद को नहीं दिखाया जा रहा। काॅरपोरेट वल्र्ड न सिर्फ मीडिया को मैनेज कर रहे हैं बल्कि पाॅलिटिक्स को भी मैनेज कर रहे हैं। इस दौड़ में बीएसपी, सपा, टीएमसी जैसी छोटी पार्टियां कहीं नज़र नहीं आ रही हैं; कहीं न कहीं सबलोग योजनबद्ध तरीके से बीजेपी के प्रति कैम्पेन करने में लगे हुए हैं।’’
आनंद प्रधान ने कहा, ’’संविधान में लिखा है कि हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी है ,जो लोग प्रेस में काम करते हैं उन्हें ये भ्रम हो जाता है कि उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी है लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी आपके पास तभी हो सकती है जब आप प्रेस के मालिक हों। आपको एक दायरे में काम करना पड़ता है। एक सीमित दायरा है जिसमें आप अभिव्यक्ति कर सकते हैं। यह दायरा भी सिकुड़ता जा रहा है। जब देश में आपातकाल लगा कई पत्रकारों ने उसका विरोध किया और उन्हें सत्ता का खौफ झेलना पड़ा। उस ज़माने की जो पत्र-पत्रिकाएं हैं उसने सवाल उठाए, लेकिन 1991 के बाद जो ग्लोबलाइजेशन शुरू हुआ उसने मीडिया के काॅरपोरेटीकरण को बढ़ावा दिया। आज हमारे यहाँ जागरण और हिन्दुस्तान जैसे अख़बारों का काॅरपोरेटीकरण हो गया है। पूँजी के आने से मीडिया का विस्तार तो हुआ, लेकिन काॅरपोरेट पूँजी जब अपना पैसा लगाती है तो उनका एक ही उद्देश्य होता है मुनाफा कमाना। उनका उद्देश्य होता है कि सीमेन्ट और स्टील जैसी कम्पनियों की तरह वे भी मुनाफा कमाएं।
आनंद प्रधान ने आगे कहा, ’’आज मीडिया कम्पनियों का सरकार पर दबाव है। संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री को यह अधिकार है कि वह यह तय करे कि उसके मंत्रीमंडल में कौन मंत्री बनेगा, किन्तु नीरा राडिया के जारी टेप से यह पता चला कि कौन मंत्री बनेगा और नहीं यह सब अब काॅरपोरेट तय करने लगा है। टाटा कम्पनी चाह रही थी ए राजा कम्यूनिकेशन मिनिस्टर बने। मणिशंकर अय्यर ने जब भारत-ईरान गैस पाइपलाइन की बात की तो उन्हें हटा दिया गया। ’मोनासन्टो’ कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी है जो बीज बनाती है। भारत में बहुत सारे पर्यावरण विशेषज्ञों के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका....फिलहाल बीटी काॅटन को इसलिए लागू कर दिया गया है क्योंकि हम इसे खाते नहीं हैं। अगर आप सतर्क न रहें तो मीडिया आपको मूर्ख बनाता रहेगा। ’इंडियन एक्सप्रेस’, ’इकोनोमिक टाइम्स’, ’टाइम्स आॅफ़ इंडिया’ में इकोनोमिक रिफाॅम्र्स की बात होगी, विकास की बात होगी। यहाँ सवाल उठता है कि विकास क्या है ? और किसका विकास ? किसकी कीमत पर विकास ? यह कौन डिफाइन करेगा कि विकास क्या है ? यूपीए-प् के शासनकाल में हरियाणा में अम्बानी को 10,000 एकड़ ज़मीन दे दी गई। इस देश के अन्दर जिन्हें अपनी ज़मीन से बेदखल कर दिया गया, उनकी आबादी एक करोड़ है। जो लोग विकास के विरूद्ध में कहेंगे उनके बारे में कहा जाएगा ये विकास विरोधी हैं।’’
आनंद प्रधान ने अपना एक अनुभव सुनाते हुए आगे कहा, ’’मेरे एक मित्र हैं-देवेन्द्र शर्मा, वे जीडीपी के बारे में बहुत अच्छी बात कहते हैं वे कहते हैं कि अगर आपके पास एक पेड़ है तो वह जीडीपी में सम्मिलित नहीं किया जायेगा, किन्तु अगर उसे काट दिया जाये, उसकी लकड़ी से फर्नीचर बनाकर बेच दिया जाये, तो उससे हुए लाभ को जीडीपी में सम्मिलित कर लिया जायेगा। हमें इस बात पर विचार करने की ज़रूरत है कि हमें जो भी संसाधन मिले हुए हैं क्या सबका उपभोग हमें ही कर लेना है ? एक सवाल है कि विकास का माॅडल कितनी अवधि तक टिका रहेगा ? सवाल यह भी है कि हमारे पास जो भी संसाधन हैं क्या वे सिर्फ हमारे लिए हैं ? क्या हमारे कोई संतान नहीं होंगी ? हमारे बाद कोई नई पीढ़ी आएगी या नहीं ? सवाल यह भी है कि क्या हम सब सिर्फ कंज्यूमर हैं ? यह मीडिया हमें सिर्फ कंज्यूमर बनाता है, लेकिन हम नागरिक भी हैं। सबसे पहले हम एक नागरिक हैं, कंज्यूमर बाद में हैं। अगर आप नागरिक होंगे तो आपको देश की चिन्ता होगी।’’
आनंद प्रधान ने वरिष्ठ पत्रकार पी0 र्साइंनाथ का हवाला देते हुए कहा, ’’हमारे मास मीडिया का वास्तविक यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है। इसने यह फैलाया दिया है कि जो भी विकास के विरोध की बात करेगा वह विकासविरोधी और देशद्रोही है। आनंद प्रधान ने आगे कहा, ’’वैकल्पिक पत्रकारिता की आज सबसे ज्यादा ज़रूरत है। काॅरपोरेट ने मीडिया और सत्ता के साथ जो लाॅबी बनाई है उसके लिए एक वैकल्पिक राजनीति और वैकल्पिक मीडिया की ज़रूरत है। कई बार यह भ्रम पैदा कर दिया जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का चैथा खम्भा है, जबकि पूँजीवादी लोकतंत्र में मीडिया काॅरपोरेट के हाथ की कठपुतली है। आज के समय में ’मीडिया लिटरेसी’ पैदा करने की ज़रूरत है। किसी भी न्यूज़ को संदेह की दृष्टि से आलोचनात्मक दृष्टि से देखने की ज़रूरत है। हमें स्कूलों में भी मीडिया के बारे में पढ़ाने की ज़रूरत है। आलोचनात्मक दृष्टि रखने वाला पाठक पैदा करने की ज़रूरत है।’’
