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Saturday, 14 June 2014

कहानी

प्रमोद कुमार बर्णवाल


                                      
                                                                जादू 

                                                                                       
                                                                             -- प्रमोद कुमार बर्णवाल                        
                                      



  
दरवाज़े  के खुलते ही उनमें हरकत हुई थी।

वे कईं थीं। कुछ ऊँची छत तक छूती आलमारियों पर सवार थीं। कुछ दीवारों पर बने हुए रैक पर। कुछ कुर्सियों पर, कुछ मेज पर पड़ी थीं। कुछ मेजों और कुर्सियों के नीचे। कुछ नंगे फर्श पर।
कुछ ताज़गी के सुवास से भरी थीं। सफेद। कुछ थोड़ा सफेद, थोड़ा पीलापन लिए। कुछ फटी हुई, मुड़ी - तुड़ी, छिद्रित। कुछ बिल्कुल पीली पड़ गईं थीं। कुछ ने अपने भीतर धूल की तहें समेट ली थीं। कुछ ने दीमकों को आश्रय दिया था, कुछ ने मकड़ी के जाले को। कुछ जीर्ण - शीर्ण हो गईं थीं। कुछ इतनी कि हाथ लगाते ही टूट कर नीचे गिरने लगे।

        वे दिखने में चिडि़यों के समान बहुत छोटी - सी थीं, इतनी कि अगर ब्रह्मांड का नक्शा बनाया जाये तो उसमें उनका अस्तित्व विलीन हो जाए ; लेकिन आश्चर्य यह था कि  वे अपने भीतर पूरे ब्रह्मांड को समेटे हुए थीं।
वे सभी उत्सुक थीं, और दरवाज़ा खोलकर अन्दर कदम रखने वाले जादूगर को बहुत अरमानों से देख रही थीं। जादूगर बहुत भूखा और बेचैन था, उसके चेहरे पर असंतुष्टि के भाव थे, जाने कौन - सी बातें उसे रह रहकर परेशान कर रहीं थीं। उसका सिर नीचे झुका हुआ था और उसमें आत्मविश्वास की कमी साफ साफ झलक रही थी।

        भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर ने बड़ी उम्मीद के साथ एक की ओर अपने हाथ बढ़ाए।
       
       जादूगर ने जिसकी ओर अपने हाथ बढ़ाए थे, उसकी खुशी का कोई पारावार ही न रहा ; वह बहुत खुश हो गई और चिडि़या की तरह उसने अपने थोड़े सफेद, थोड़े पीले पंख फड़फड़ाने शुरू कर दिए।
जादूगर के हाथों का सुखद स्पर्श पाते ही उस चिडि़या ने अपने पंखों को फड़फड़ाना बन्द कर दिया ; और शान्तचित्त होकर जादूगर के अगले कदम का इंतज़ार करने लगी। जादूगर ने उसके पहले पंख पर अपनी नज़रें डालीं और वहाँ उगे मातियों को निहारने लगा।

        अपने पहले पंख पर जादूगर की नज़रें पड़ते ही उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और मन  ही मन खुदा से प्रार्थना करने लगीं।

      कुछ देर तक पहले पंख पर उगे मोतियों को निहारने के बाद जादूगर ने उसे आलमारी में वहीं रख दिया जहाँ से उसे उठाया था।

       जादूगर द्वारा फिर से आलमारी में रख दिए जाने पर वह बहुत उदास हो गई। खुदा के द्वारा उसकी प्रार्थना ठुकरा दी गई थी, मन में यह ख़याल आते ही उसे और भी बुरा लगने लगा ; वह आत्मग्लानी से भर गई। उसका हृदय शोक से भर गया ; शोक में वह अपना संतुलन ठीक से रख नहीं पा रही थी। अचानक उसके कदम लड़खड़ाए, और वह तेजी से आलमारी से नीचे फर्श की ओर गिरने लगी।

     नीचे गिरने पर उसका क्या अंजाम होगा, इसकी कल्पना कर वह सिहर गई। उसने डर से अपने सारे पंख जोर - जोर से फड़फड़ाने शुरू कर दिए। जोर से आवाज़ करते हुए वह फर्श पर गिर पड़ी ; गिरते समय वह फर्श पर कुछ दूर तक घिसटती चली गई। उसके कुछ पंख टूट गए थे ; अपने टूटे पंखों को देखकर वह दुख से भर गई। उसने एक नज़र जादूगर पर डाली और बहुत ही हसरत से उसे देखने लगी।
लेकिन उसे मायूस होना पड़ा, जादूगर ने नज़रें उसकी ओर से फेर लीं थीं, और दूसरी आलमारी की ओर अपने कदम बढ़ा दिए थे।
      
            जादूगर  दूसरी आलमारी की ओर बढ़ा। जादूगर को अपनी ओर बढ़ते देख उस आलमारी पर बसेरा करने वालीं सारी चिडि़या अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। वे बहुत ही आशा से जादूगर को देखने लगीं। जादूगर ने एक सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या की ओर अपने हाथ बढ़ा दिए , और उसे अपनी हथेलियों में भर लिया। जादूगर के द्वारा स्पर्श किए जाने के कारण सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या गर्व से भर गई, और थोड़ा अहं से भी।

-----गर्व से इसलिए क्योंकि अन्य चिडि़या  उसे अदा कदा चिढ़ाती रहती थीं कि उसका कोई कद्रदान नहीं। अनेक जादूगर उस आलमारी के पास से गुजरते, वे अन्य को स्पर्श करते, किन्तु एक लम्बे समयांतराल से उस सफेद - पीले पंख वाले चिडि़या की ओर किसी ने देखा तक नहीं था।

-----अहं से इसलिए क्योंकि लम्बे समयांतराल से उसे किसी ने स्पर्श नहीं किया था, और आज जब किसी ने उसे स्पर्श किया तो उसे लगा कि उसका आज भी महत्व है। उसके बिना काम नहीं चल सकता। वह बेकार नहीं हुई है।

         और यह भाव आते ही उसने अपने सारे पंख आपस में जोर से चिपका लिए।
        जादूगर ने उस चिडि़या का एक पंख खोलने की कोशिश की, पर वह खोल नहीं सका। जादूगर ने फिर कोशिश की, लेकिन चिडि़या तब भी नहीं मानी। जादूगर ने अपनी उंगुलियों का दबाव डाला, लेकिन चिडि़या भाव खाती रही, उसने अपने पंख नहीं खोले। तब जादूगर ने हाथ की उंगुली अपने मुँह में डाली ; और लार से अपनी उंगुली गीली करने लगा। उसने अपनी गीली उंगुली से पंख को स्पर्श किया ; चिडि़या की आँखें भर आईं, और उसने अपने पंख खोल दिए। एक पंख को निहार लेने के बाद जादूगर ने दूसरे पंख को खोलने की कोशिश की ; चिडि़या ने खुशी खुशी अपना दूसरा पंख जादूगर के सामने खोल दिए। जादूगर ने चिडि़या के कुछ और पंख खोलने की कोशिश की ; चिडि़या खुशी खुशी जादूगर का साथ देती रही।
       
          कुछ पंखों को निहार लेने के बाद जादूगर ने उस चिडि़या को पुन: आलमारी में रख दिया। वह चिडि़या खुशी से भर गई थी, वर्षों बाद किसी ने उसे स्पर्श किया था। उसने गर्व से अपने अगल बगल के चिडि़यों को देखा। अगल बगल की चिडि़या उसे ईष्र्या से देख रहीं थीं। अगल बगल की चिडि़यों में से एक झक्क सफेद पंख वाली चिडि़या बहुत ही शर्मिन्दा होने लगी थी, ऐसा इसलिए क्योंकि सफेद - पीले पंख वाले चिडि़या को सबसे ज़्यादा वही चिढ़ाती थी। एक बार तो झक्क सफेद पंखों वाली चिडि़या  ने सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या पर व्यंग्य करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि ’’तुम बूढ़ी हो चुकी हो, तुम आउट आॅफ सिलेबस हो।’’ 

    इस पर सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या ने अपना बचाव करते हुए कहा था, ’’नहीं, ऐसा नहीं है। कोई न कोई तो ज़रूर होगा जो मुझमें उगे मोतियों को चुगना चाहेगा ; कोई न कोई मेरे मोतियों का कद्रदान ज़रूर होगा।’’

झक्क सफेद पंखों वाली चिडि़या ने जोर - जोर से हँसते हुए कहा, ’’तुम भ्रम में जी रही हो, तुम्हारा ज़माना लद गया। अब बाज़ार में अनेक नई चिडि़या आ गईं हैं, उनकी मांग ज़्यादा है, तुम्हें कोई नहीं पूछेगा।’’

सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या ने कहा, ’’मैं ऐसा नहीं मानती, तुमने मुझसे ज़्यादा दुनियाँ नहीं देखी है।’’

’’अगर ऐसा है तो क्यों नहीं इस बात पर शर्त लग जाए।’’

’’ठीक है, बताओ क्या शर्त लगाती हो ?’’

’’अगर आज के बाद कोई तुम्हें स्पर्श करता है तो फिर मैं तुम्हें अपना चेहरा कभी नहीं दिखाऊँगी।’’

’’ठीक है।’’

         सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या ने झक्क सफेद पंखों वाली चिडि़या को बहुत ही गर्व से देखा। झक्क सफेद पंखों वाली चिडि़या को उसकी नज़रें बर्दाश्त नहीं हो पा रहीं थीं, उसने नीचे फर्श की ओर देखा, और छलांग लगा दी। वह अंधेरे में कहीं खो गई।
     
         इन सब बातों से अन्जान जादूगर ने अब तक आलमारी में रखी दूसरी चिडि़या को उठा लिया था, और उसमें उगे मोतियों को निहारने लगा। दूसरी चिडि़या बहुत खुश हो गई।
   
           जादूगर ने दूसरी चिडि़या के कुछ पंखों को उलट पलट कर देखा, और फिर उसे आलमारी में रख दिया। दूसरी चिडि़या सिसकिया लेने लगी। दरअसल जादूगर ने उसे आलमारी के सबसे ऊपर वाले रैक से उठाया था, किन्तु वहाँ रखने की बजाय उसने उसे नीचे के रैक पर रख दिया। दूसरी चिडि़या तीन महीने पहले किसी और आलमारी में रहा करती थी, उससे दो महीने पहले किसी और आलमारी में ; वह बार - बार कुछ जादूगरों की लापरवाही के कारण इधर से उधर विस्थापित होती रही थी। कई जादूगर थे जो दूसरी चिडि़या के कद्रदान थे, वे उसे सहेज कर रखना चाहते थे। वे कई बार उसे ढूंढते हुए उसके पुराने घर में जाते रहे थे, किन्तु उसके न मिलने पर  उदास होकर किसी और चिडि़या से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करने लगे थे। 
         
         जादूगर  एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने एक पुरानी चिडि़या को उठाया। पुरानी चिडि़या जादूगर का स्पर्श पाते ही प्रसन्न हो गई।
जादूगर ने पुरानी चिडि़या के कुछ पंखों को उलटा पलटा और खूब प्रसन्न हो गया। जादूगर को प्रसन्न होते देख पुरानी चिडि़या को यह समझते देर नहीं लगी कि उसके पंखों में वैसे मोती उगे हैं जिनकी जादूगर को तलाश थी।
      
           अचानक जादूगर उदास हो गया। पुरानी चिडि़या को जादूगर की उदासीनता का कारण समझने में देर नहीं लगी ; वह भी उदास हो गई। जादूगर ने पुरानी चिडि़या को उठाया और वहीं रख दिया जहाँ से उसे उठाया था। पुरानी चिडि़या ने कहना चाहा, ’’इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, कुछ दिनों पूर्व एक और जादूगर आया था, उसने मुझे उठाया, और अपने काम के पंख तोड़ कर ले गया, मैं असहाय भाव से उसे देखती रही, मैं कुछ भी नहीं कर सकी।’’
          
          जादूगर एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने एक चिडि़या को उठाया, और उसके कुछ पंख देखने लगा। जादूगर जैसे जैसे चिडि़या के पंख देखता जाता था, वैसे वैसे उसकी उंगुलियों पर धूल लगता जाता था।
      
         चिडि़या जादूगर के स्पर्श से खुश तो हो रही थी पर वह थोड़ी शर्मिन्दगी भी महसूस कर रही थी, वह जादूगर से कहना चाह रही थी, ’’इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, मेरी देखरेख और साफ - सफाई की जि़म्मेदारी जिसपर है वह अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाता, तो इसमें मेरी क्या ग़लती ?’’
        
          धूल लगे पंखों से एक पुरानी गंध निकल रही थी। पुरानी गंध जादूगर के नथुनों से टकराई, और उसे जोर की छींक आ गई। जादूगर ने जल्दी से धूल लगे पंखों वाली चिडि़या को पुन: आलमारी में रख दिया और वहाँ से थोड़ी दूर हट गया। उसने अपना रूमाल निकाला, अपने हाथों में पड़े धूल को झाड़ा और अपनी नाक साफ करने लगा।
       
           जादूगर एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने उस आलमारी से एक चिडि़या निकाला, और उसके पंखों का अवलोकन करने लगा। उसने चिडि़या के एक एक पंख को देखा। अचानक जादूगर बहुत खुश हो गया। चिडि़या के पंख थोड़े पीले पड़ गए थे ; किन्तु सारे के सारे पंख सही सलामत थे। जादूगर ने खुशी से चिडि़या को चूम लिया। चिडि़या थोड़ा शर्माई फिर गर्व से भर गई।
    
         जादूगर ने उस थोड़े पीले पड़ गए चिडि़या को बहुत प्यार से उठाया और कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा। अन्य चिडि़या उस थोडे़ पीले पड़ गए चिडि़या को जादूगर के सिर पर मान सम्मान के साथ जाते हुए देखने लगी थीं, और मन  ही मन उसकी किस्मत से ईष्र्या करने लगी थीं। जादूगर कमरे से निकल गया, और सारी चिडि़या उदास हो गईं। वे सब शान्त हो गईं, और इंतज़ार करने लगीं कि कभी न कभी, कोई न कोई जादूगर उस कमरे में आएगा जो उनका कद्रदान होगा ; और वे चिडि़या भी अपने कद्रदानों के सिर पर मान सम्मान के साथ सवार होकर सैर को निकल जाएंगी।
        
          भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर कमरे से निकलकर एक ओर को गया। वहाँ अनेक मेजें और कुर्सियां लगी हुईं थीं। वहाँ पहले से अनेक छोटे बडे़ जादूगर बैठे हुए थे, तो कुछ कुर्सियां खाली भी थीं। भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर एक खाली कुर्सी पर बैठ गया, और सामने की मेज पर अपने साथ लाए चिडि़या को रख दिया। जादूगर ने बहुत प्यार और ध्यान से चिडि़या के पंखों को उलटना पलटना शुरू किया। चिडि़या के सारे पंखों पर अनेक मोती उगे हुए थे ; जादूगर ने एक पंख खोला और उसमें स्थित सारे मोतियों को खाने लगा, फिर उसने दूसरा पंख खोला और उसमें स्थित मोतियों को खाने लगा। आश्चर्यजनक यह था कि भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर जितने मोती खाता जाता था, उतने मोती फिर से पंखों पर उगते जाते थे।
        
           चिडि़या वर्षों से लोगों की सेवा करती आई थी। वह लोगों को सभ्य, सुसंस्कृत, और जानकारी से परिपूर्ण करती रही थी। किन्तु कई लोग चिडि़या के इस सेवा - भाव से परेशान भी हुए थे ; कई आतताइयों, हुड़दंगियों, और तानाशाहों ने उसे नष्ट भ्रष्ट करने का प्रयास किया ; कई ने चिडि़यों  को उनके आलय में ही जलाकर मार डालने का प्रयास किया, किन्तु तब भी चिडि़यों का अस्तित्व बचा रहा। आतताइयों ने चिडि़यों पर बार बार अत्याचार किए ; किन्तु वे चिडि़यों का कुछ बिगाड़ नहीं पाएं। चिडि़यों पर जितना अत्याचार बढ़ा उनके चाहने वाले भी बढ़ते गए।
        
            इधर कुछ समय से चिडि़या एक अजीब संकट से गुजर रहीं थीं। इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों के विकास और उनकी लोकप्रियता ने चिडि़यों के सामने एक नया प्रतिद्वंद्वी खड़ा कर दिया था। कुछ बुद्धिजीवी तो यहाँ तक कहने लगे थे कि अब चिडि़यों का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है, वे जल्द ही नष्ट हो जाएंगी।
     
            भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर चिडि़या के पंखों को उलटता पलटता रहा और उसमें स्थित मोतियों को खाता रहा। जादूगर शब्दों और ज्ञान का जादूगर था, वह लोगों के बीच अपनी वक्तृत्व शैली के लिए प्रसिद्ध था, उसे विभिन्न गोष्ठियों में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता। उससे जब भी कोई सवाल किया जाता वह मुस्कुराते हुए आत्मविश्वास के साथ उसका जवाब देता। वह ऐसा जवाब देता कि लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते थे। उसके पास राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक सभी तरह के जवाब होते थे। वह जब भी किसी के पूछे सवाल का जवाब नहीं दे पाता, चिडि़यों के पास चला आता। हाल ही में किसी मित्र ने उससे कोई सवाल किया था, उस समय वह उसका जवाब नहीं दे पाया था और तब से ही वह परेशान था, उसे अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती महसूस हुई थी। इससे उसका आत्मविश्वास थोड़ा कम हुआ था। उसी सवाल का जवाब पाकर अपनी इज्जत बचाने के लिए वह इस समय चिडि़या की शरण में आया था।
       
              जादूगर के पास इलेक्ट्राॅनिक माध्यम भी था, और वह जब तब उसका प्रयोग भी करता था। इलेक्ट्राॅनिक माध्यम को रखना और सहेजना सहज और आसान था, वह कम जगह भी घेरती थी ; तब भी कुछ था जो उसे चिडि़यों के पास आने के लिए आकर्षित करता था।
      
             जादूगर मोतियों को लगातार खाए जा रहा था। वह जैसे जैसे मोतियों को खाए जा रहा था उसकी भूख मिटती जा रही थी, उसकी बेचैनी घट रही थी। वह मित्र द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब से रू ब रू होने लगा था। उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा, उसका चित्त ग़ज़ब का शान्त होने लगा। चिडि़या के पंखों के सुखद स्पर्श ने उसमें जादू भर दिया था।
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 प्रमोद कुमार बर्णवाल                        

प्रकाशन:- 1. कादम्बिनी, वागर्थ, परिकथा, युद्धरत आम आदमी, कथादेश में कहानियां प्रकाशित।
          2. कादम्बिनी, वागर्थ, परिकथा, प्रगतिशील वसुधा, शब्दयोग, कथाक्रम में लेख प्रकाशित।

सम्मान: पहली कहानी ’जिंदगी या मौत ’ कादम्बिनी द्वारा आयोजित युवा कहानी प्रतियोगिता 2003 में सांत्वना पुरस्कार से सम्मानित।                                          
सम्प्रति:- बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी।                                                         

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