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Tuesday, 15 July 2014





  ’ब्लैक’:  प्रेरणा का संचार करती एक फि़ल्म
     

-- प्रमोद कुमार बर्णवाल





 

       हम मनोभावों को प्रकट करने के लिए शब्दों और ध्वनियों का सहारा लेते हैं और गंतव्य तक पहुंचने के लिए रोशनी का। किंतु जरा उस स्थिति पर विचार करें, जब सभी शब्द और ध्वनियां सन्नाटे में बदल जाएं और सारी रोशनी अंधेरे में। ऐसी स्थिति में जि़ंदगी क्या हो जाएगी ? सिर्फ़ और सिर्फ़ ’ब्लैक’। संजय लीला भंसाली निर्देशित और अमिताभ बच्चन, रानी मुखर्जी एवं आयेशा कपूर की मुख्य भूमिका वाली ’ब्लैक’ ऐसी ही एक युवती मिशेल यानी रानी मुखर्जी की कहानी है, जिसके पास रूप-सौंदर्य और यौवन तो है किंतु भावों को प्रकट करने के लिए जुबान नहीं है। भाषा के संचार के लिए श्रव्य-शक्ति महत्वपूर्ण है किंतु वह श्रव्य-शक्ति से भी महरूम है और तो और उसके लिए दिन और रात, अंधकार और प्रकाश एक समान हैं क्योंकि वह नेत्रहीन है।

         सुख और दुख का, प्रकाश और अंधकार का, ब्लैक और व्हाइट का गहरा संबंध है। वही व्यक्ति सुख का अनुभव कर सकता है, जिसने दुख की घडि़यां बितायी हों, वही व्यक्ति रोशनी की महत्व समझ सकता है, जिसने अंधकार भी देखा हो और इसलिए ’ब्लैक’ एक ऐसे व्यक्ति देवराज सहाय यानी अमिताभ बच्चन की भी कहानी है, जिनका रोशनी से नाता है; ना सिर्फ शारीरिक क्षमता के आधार पर बल्कि अपने पेशे के आधार पर भी। क्योंकि पेशे से वह एक शिक्षक है और उसका कार्य है- अंधेरे से पीडि़त लोगों की  ज़िन्दगी  में रोशनी का संचार करना।
  
       नन्ही मिशेल यानी आयेशा कपूर जानवर सी जि़ंदगी बिताने के लिए मजबूर थी। जब वह आठ साल की बच्ची थी, उसके माता-पिता उसकी कमर में एक घंटी बांध देते थे, ताकि जब वह आंखों से ओझल हो जाये, तो उसे घंटी की आवाज़ से ढूंढा जा सके। वे ऐसा अपनी सुविधा के लिए करते थे। लेकिन प्रत्येक समाज की अपनी भाषा होती है, जिस तरह से बोलने में सक्षम लोगों की अपनी भाषा होती है, उसी तरह से मिशेल जैसे लोगों की भी अपनी भाषा होती है। इस बात को देवराज सहाय अनुभव करते हैं। वे जानते हैं कि मिशेल की भी अपनी दुनिया है, वह वस्तुओं और भावनाओं को महसूस तो करती है, किंतु उसके पास उन्हें प्रकट करने के लिए शब्द नहीं हैं। देवराज सहाय यानी अमिताभ बच्चना मिशेल की मां से कहते भी हैं-- ’मिशेल इज़ डिफरेंट........शी इज़ नाॅट मेंटली रिटायर्ड। उसे शब्द की पहचान चाहिए। हर वो चीज जो वह छूती है, जो वह खाती है, उसका एक नाम है, उस नाम का एक अर्थ है।’

         वैसे भी सिर्फ जुबान ही अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती है, बल्कि अनेक दैहिक क्रियाएं भी अभिव्यक्ति का माध्यम होती हैं। मिशेल के पिता द्वारा देवराज सहाय से यह पूछने पर कि मिशेल को आप इंसान किस प्रकार बनायेंगे ? देवराज सहाय अपने हाथों की उंगुलियां फैला देते हैं और कहते हैं कि उंगुलियां अंधों की आंखें हैं, गूंगों की आवाज़ और बहरों की कविता। मतलब वे कहना चाह रहे हैं कि मिशेल के पास जुबान ना सही, पर दैहिक हरकतों द्वारा भावाभिव्यक्ति की क्षमता है।
 
         मिस्टर सहाय की बात शत-प्रतिशत सही है। ब्लैक की दुनिया में रहते हुए मिशेल ने अपना भाषा प्रतिमान गढ़ लिया है। उसे जब अपनी मां को बुलाना होता है, तो वह अपना दाहिना हाथ दाहिने गाल पर रख लेती है। इसी तरह से भूख लगने पर वह डायनिंग टेबल को अपने हाथों से टमर-टमर कर देखती है और भोजन को मुंह में डाल लेती है। किसी से मिलने पर वह आंखों से ना सही, पर अपनी उंगुलियों से छूकर पहचानने का प्रयत्न करती है।
   
        जब पहली बार वह देवराज सहाय से मिलती है, तो उसके चेहरे को अपनी उंगुलियों से छूती है। जब उसकी उंगुलियां देवराज सहाय की आंखों पर चढ़े चश्मे पर पड़ती हैं तो वह आश्चर्य से भर जाती है। पुनः वह अपनी आंखों को स्पर्श करती है और उसका चेहरा उदास हो जाता है। यहां मिशेल के चेहरे का भाव इस बात को प्रकट करने में सहायक है कि देवराज सहाय की आंखों पर जिस तरह से चश्मा चढ़ा हुआ है, उसे भी अपनी आंखों पर लगाने के लिए चश्मा चाहिए। उसने जुबान से कुछ कहा नहीं है वैसे भी वह उसमें असमर्थ है, किंतु देवराज सहाय उसकी मुखाकृति देखकर उसके भावों को समझ जाते हैं। इस तरह से जब देवराज सहाय घर के एक हिस्से को मिशेल द्वारा अनछुई चीजों से भर देते हैं तो वह भयभीत हो जाती है। अपने दाहिने हाथ की उंगुलियों को अपने दाहिने गाल पर रख लेती है और मां को बुलाने का प्रयास करती है। वह बैचेनी से अंधेरे में मां की खोज में भटकती है और बंद दरवाजे पर जोर-जोर से हाथ पटकती है। यहां दरवाजे पर जोर-जोर से हाथ पटकना और यहां-वहां कदम बढ़ाना, उसमें संचारित भय को प्रदर्शित करता है।
     
         नन्ही मिशेल शारीरिक रूप से डिफरेंट भले ही हो किंतु वह मेंटली रिटायर्ड नहीं  है। इसे प्रेमचंद लिखित ’गोदान’ के एक उदाहरण से समझ सकते हैं-- ’बालक मालती की गोद में आकर जैसे किसी बड़े सुख का अनुभव करने लगा। अपनी जलती हुई उंगुलियों से उसके गले की मोतियों की माला पकड़कर अपनी ओर खींचने लगा। मालती ने नेकलेस उतारकर उसके गले में डाल दिया। बालक की स्वार्थी प्रकृति इस दिशा में भी सजग थी। नेकलेस पाकर अब उसे मालती की गोद में रहने की कोई ज़रूरत न रही। यहां उसके छिन जाने का भय था। झुनिया की गोद इस समय ज़्यादा सुरक्षित थी।’
      
             झुनिया का बालक बीमार है जिसे मालती गोद में ले लेती है और वह ऐसी हरकत करता है। ऐसी ही हरकत मिशेल भी करती है। जब मि0 सहाय उसे अपना चश्मा उतारकर देते हैं, वह उसे धारण करती है और तुरंत अपनी मां को इशारा करती है तथा उसकी गोद में शरण ले लेती है। अगर उसे ज्ञान नहीं होता, तो वह शायद ऐसा नहीं कर पाती।
      
            यहां एक बात ध्यान देने की है कि सिर्फ़ मिशेल जैसे बेजुबान लोग ही दैहिक भाषा का प्रयोग नहीं करते हैं, बल्कि शारीरिक रूप से तंदरुस्त लोग भी इसका प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, जब देवराज सहाय छोटी बच्ची मिशेल की कमर में घंटी बंधी हुई देखते हैं, तो कुपित होते हैं। वे उसके पिता को ऐसा ना करने के लिए कहते हैं। वे खीझते हुए कहते हैं कि जब मां-बाप ही बच्ची को जानवर समझेंगे तो इसे कोई इंसान कैसे मानेगा ? अभी तो लोग इसे अंधी कहते आ रहे हैं, पर अब उसे लोग पागल कहने लगेंगे। मिशेल के पिता पर देवराज सहाय की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, वे मि0 सहाय को टर्मिनेशन लेटर देते हैं और ’गुड नाइट’ कहते हुए वहां से चल देते हैं। जाहिर सी बात है इस तरह अपने को नज़रअंदाज किये जाने पर देवराज सहाय में आक्रोश का संचार होगा, और इसे वह अपनी दैहिक जबान में प्रदर्शित करते हैं। वह भी जवाब में ’गुड नाइट’ तो कहते हैं, किंतु साथ ही अपने दाहिने हाथ से घंटी को भी बजाते हैं। यहां घंटी बजाना, सिर्फ़ घंटी बजाने जैसा नहीं है, बल्कि क्रोध और खीझ के प्रकटीकरण का एक जरिया है।
      
            इसी तरह से जब मिशेल पहली बार शब्द और उसके अर्थ को समझ पाने में सफल होती है और अपनी माता को मां कहकर संबोधित कती है, तो उसके पिता खूब खुश हो जाते हैं। वे अपनी दोनों हथेलियों को ताली बजाने के अंदाज़ में आपस में मिलाते हैं और फिर अपनी उंगुलियों को एक-दूसरे में भींच लेते हैं।
     
           किसी के करतब या भाषण को देख-सुन कर आप खुशी में ताली बजाते हैं। किंतु यहां मिशेल की क्रियाशीलता ने उसके पितृत्व के सुख को अनुप्राणित कर दिया है। यहां उन्हें आंतरिक खुशी मिलती है। यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि कई बार आपके मस्तिष्क में जो कुछ चलता रहता है, कोई ज़रूरी नहीं है कि उसे करने के लिए आपको दैहिक हरकत करनी पड़े। कई बार स्वयं अवचेतन रूप में आपका शरीर इसे प्रकट कर देता है। उदाहरण के लिए, आप भले ही किसी से मिलने पर मीठी जुबान में बात करें, किंतु आपके मन में उसके प्रति असम्मान का भाव है तो वह आपकी शारीरिक हरकतों से स्वयं प्रकट हो जायेगा। यहां देवराज सहाय द्वारा अपनी खीझ को प्रकट करने के लिए भले ही घंटी का सहारा लिया गया हो, किंतु मिशेल के पिता जब बहुत खुश होते हैं, तो हथेलियां तथा उंगुलियां स्वयं ही जुड़ जाती हैं।
      
             वास्तव में हम जो कुछ भी देखने में सक्षम हो पाते हैं, वह सिर्फ़ आंखों की बदौलत नहीं, बल्कि उजाले का भी उसमें महत्वपूर्ण स्थान होता है। अंधी नन्ही मिशेल कमरे के नये माहौल में आकर जब चलना शुरू करती है तो किसी वस्तु से टकराकर गिर जाती है। ठीक वैसे ही अचानक बिजली के चले जाने पर अंधेरे में चलते समय देवराज सहाय भी गिर पड़ते हैं। दरअसल महत्व आंखों का नहीं, उजाले का होता है। अंधेरे में आंखें किसी काम की नहीं होती।
      
         भावाभिव्यक्ति के लिए जुबान के साथ शारीरिक क्रिया भी सहायक होती है। हर शब्द का एक अर्थ होता है। बिना शब्दार्थ समझे कोई भी व्यक्ति अंधेरे की दुनिया से कभी भी बाहर नहीं निकल सकता, वह जानवर की भांति  ज़िन्दगी गुजारने को मजबूर हो जायेगा। इन बातों को देवराज सहाय भलीभांति समझते हैं और मिशेल को भी समझाने की कोशिश करते हैं। वे स्पून और नेपकिन मिशेल के हाथों में दे देते हैं और अपनी उंगुलियों के पोर से उसकी बांहों में इन चीजों की स्पेलिंग लिखते हैं। किसी भी शब्द को कहने पर जुबान अलग-अलग हरकत करती है, जहां ’A’ बोलने पर होंठ फैल जाते हैं, वहीं  ’B’ बोलने पर ये सट जाते हैं। देवराज सहाय मिशेल की हथेली को अपने होठों से स्पर्श करते हैं और मिशेल होठों के फैलने-सिकुड़ने से शब्दों को पहचानने में सक्षम बन पाती है।
       
          जब आप गुलाब के फूल को हाथों में पकड़ते हैं और ग़लती से कांटे आपकी उंगुलियों में चुभ जायें तो दर्द की अनुभूति होती है। फूल और कांटा एवं खुशी और दर्द में गहरा रिश्ता होता है। मिशेल की मां देवराज सहाय से विनती करती है कि वह मिशेल को यह भी सिखायें कि उसके हिस्से फूल नहीं, कांटे हैं। देवराज सहाय इस बात को भलीभांति समझते हैं और इसलिए कभी प्यार से तो कभी डरा-धमकाकर और कभी मार-पीटकर मिशेल का परिचय शब्दों से कराते हैं।
      
           शब्द और उसके अर्थ से परिचय होने के बाद मिशेल के जीवन में सुखद परिवर्तन आता है। वह सभ्य तरीके से खाना-पीना, अपने भावों को प्रकट करना और पढ़ना-लिखना सीख जाती है। मि0 देवराज सहाय चाहते हैं कि मिशेल खूब पढ़े, आम लड़कियों की तरह ग्रेजुएट बने। मिशेल जैसे लोगों के लिए अलग स्कूल-काॅलेज बने हुए हैं, जहां उन्हें टोकरी और चटाई बनाने का काम सिखाया जाता है, किंतु मि0 सहाय उसे यूनिवर्सिटी में दाखिला दिलवाते हैं और इस तरह से मिशेल की एक नई जि़ंदगी की शुरुआत होती है, एक नया आसमां, एक नयी उड़ान।
      
           मि0 सहाय को मिशेल की क्षमता पर भरोसा था और मिशेल को अपने पंखों पर। एक नई दुनिया के दरवाज़े उसके लिए खुलने लगे थे। यूनिवर्सिटी के टीचर के यह कहने पर कि- ’हम अपनी आंखों से सपने देखते हैं........’ वह उतेजित होते हुए अपने संकेतों से कहती है-- ’आंखें सपने नहीं देखती, मन सपने देखता है। मैं आंखों से देख नहीं सकती, फिर भी मैं सपना देखती हूं। मेरा सपना है कि मैं एक ग्रेजुएट बनूं।’ और इसके लिए वह बार-बार प्रयास करती है। मि0 सहाय उसे एक मकड़ी की कहानी सुनाते हैं जो कई कोशिशों के बाद अपना घर बना पाती है। वे बार-बार मिशेल को सफलता पाने के लिए प्रेरित करते रहते हैं।
     
           किंतु समयांतराल के साथ मिशेल में कुछ परिवर्तन भी होने लगा था। उसमें स्कूली छात्रा जैसी कोमलता और मासूमियत का लोप हो रहा था। अब वह आठ साल की बच्ची ना रहकर एक 27-28 साल की युवती हो गयी थी। उसमें एक नया रोमांच उभर रहा था। सारे स्पर्श नये से लगने लगे थे। ऐसे ही समय में उसके परिवार में एक घटना घटी, जिसने उसमें उभर रही इस नई इच्छा को और भी बलवती कर दिया। ये घटना थी उसकी छोटी बहन शेयरा का विवाह। विवाह में अंगूठी पहनाने के बाद उसके पति द्वारा उसके होठों पर किस किया जाता है। किस लेने के बाद शेयरा की आंखों से आंसू बहने लगते हैं, ये खुशी के आंसू हैं जबकि मिशेल स्वयं में उदासी महसूस करती है। पिंजरे में कैद पक्षी जिस प्रकार खुले आकाश में स्वच्छंद विचरण के लिए बेचैनी महसूस करता है, ठीक वैसी ही विकलता मिशेल महसूस करती है।
      
            साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ’मैला आंचल’ उपन्यास में एक जगह लिखते हैं कि एक जवान आदमी को शारीरिक भूख नहीं लगे तो वह निश्चय ही बीमार है, अथवा एब्नाॅर्मल है। मिशेल मेंटली रिटायर्ड नहीं थी और ना ही वह एब्नाॅर्मल थी, अतः किसी पुरूष की सांसों की गर्माहट और होठों की चुभन महसूस करने की उसकी कामना भी बलवती होती जाती है, वह अपने अंदर छुपे औरत को प्रकट करना चाहती है।
     
           जि़ंदगी की जिस डगर पर वह अब तक बेतहाशा दौड़ रही थी, उसके अगल-बगल आस-पास कहीं क्षण भर सुस्ताने के लिए किसी छांव की तलाश की उसकी यह इच्छा बलवती होती जाती है। और उसकी जि़ंदगी में मि0 सहाय के अलावा किसी अन्य पुरूष की शीतल छाया कभी पड़ी ही नहीं थी।
      
            उचित अनुचित को ताक पर रखकर वह अपनी यह नई इच्छा अपने टीचर के सामने रख देती है। मि0 सहाय उसकी इस कामना पर क्रोधित होेते हैं और समझाने की कोशिश करते हैं। किन्तु जब मिशेल रोने-धोने लगती है, बहुत उदास हो जाती है, तो वह अपने होंठ उसके होंठों पर रख देते हैं। मिशेल रो-धोकर अपने लिए खुशी ढूंढ ही लेती है। उस एक पल में अपने औरत होने का सम्मान पा ही लेती है।
     
         किन्तु यहां यह ध्यातव्य है कि एक व्यक्ति किसी वस्तु या घटना को जिस रूप में देखता है, कोई ज़रूरी नहीं है कि दूसरा भी उसे उसी रूप में ले। ऊपर से बावजूद एक-सा गाते दिखने के एक ही गीत विभिन्न गायकों द्वारा एक ही राग में नहीं गाया जा रहा होता है। मि0 सहाय ने एक पिता की तरह मिशेल को जीना सिखाया था, किंतु इस घटना से वे खुद अपनी ही नज़रों में गिर गये। मिशेल ने उनसे कुछ ज़्यादा ही मांग लिया था।
      
   मिशेल ने भी इसे बाद में महसूस किया, जब मि0 सहाय उसे छोड़कर बहुत दूर चले गये।
      
       मिशेल को जीना सिखाते-सिखाते मि0 सहाय खुद ही भूलने की बीमारी से पीडि़त होने लगे थे, किंतु अपनी नज़रों में गिरने के बाद वे पूरी तरह से अल्जाइमर के रोगी हो गये। वे मिशेल की जि़ंदगी से दूर चले गये। जाते-जाते भी वे मिशेल के लिए एक संदेश छोड़ गये थे...........मैं जा रहा हूं मिशेल। एक बात जो मैं चाहता हूं उसे हमेशा याद रखो। वो ये कि अंधकार हर वक्त बार-बार तुम्हें अपनी गिरफ्त में लेने को बेताब रहेगा। पर तुम हमेशा रोशनी की राह चलना। विश्वास से भरा हुआ तुम्हारा हर कदम मुझे जिन्दा रखेगा मिशेल।
  
          मिशेल ’ब्लैक’ की दुनिया में रह रही थी, किंतु एक आवाज़ ने उसे शब्द और अर्थ से परिचित कराया। अब वह आवाज़ उसके साथ नहीं थी, किंतु उसकी गूंज तो अब भी उसके दिलो-दिमाग में संचित थी। वह बारह साल तक मि0 सहाय के दिखाये रास्ते पर चलती रही अकेले अंधेरे में। और अकेले अंधेरे में चलकर आखि़र उसने अपनी मंजिल को पा ही लिया। जिस तरह से मकड़ी बार-बार गिरने के बावजूद कई कोशिशों के बाद अपना घर बना ही लेती है। चींटी पहाड़ पर चढ़ जाती है उसी तरह से मिशेल अपने चालीसवें साल में ग्रेजुएट हो जाती है।
     
         वह बचपन में जो भी काम करती थी बाकी लोगों से हमेशा पीछे रहती थी। उसकी वजह से उसके माता-पिता का सिर शर्म से झुक जाता था। वह हर साल अपने घर फ़ोन करती थी और अपने फेल होने की सूचना मां को देती थी। किंतु आज वह अपने घर फ़ोन करेगी और बतायेगी कि वह पास हो गई है। उसे विश्वास है कि आज उसके मम्मी-पापा बहुत गर्व महसूस कर रहे होंगे और सबसे कह रहे होंगे कि वह उनकी बेटी है। मिशेल बहुत खुश है क्योंकि वह ग्रेजुएट हो गई। किंतु एक दुख उसे अंदर ही अंदर खाये जा रहा है। यह दुख है उसके टीचर की बीमारी।
      
           प्रसिद्ध अभिनेता, निर्माता-निर्देशक राजकपूर की फि़ल्म ’मेरा नाम जोकर’ में एक जगह किशोर छात्र राजू यानी ऋषि कपूर अपनी टीचर से प्रश्न करता है--’क्राइस्ट हर तस्वीर में उदास ही क्यों नज़र आते हैं ?’ इसके जवाब में उसकी टीचर कहती है-- ’क्राइस्ट इसलिए नहीं हंसते, क्योंकि दुनिया में उनके अनेक बेटे दुखी हैं।’ यह सुनकर राजू कहता है-- ’मैं क्राइस्ट को हंसाऊंगा।’ इसके बाद वह जोकर बनकर दुनिया को हंसाता चलता है। मिशेल की जि़ंदगी भी ’ब्लैक’ थी। बचपन में वह हाथ फैलाकर कुछ ढूंढती रहती थी। उंगुलियों से कुछ टटोलती रहती, पर आखि़र में हाथ में सिर्फ़ अंधेरा ही रह जाता था। तब उसकी जि़ंदगी में मि0 सहाय आये, एक ’प्रकाश-सतंभ’ बनकर, ’गाॅड’ बनकर। वे सालों-साल उसे मार्गदर्शन देते हुए अंधेरे से रोशनी में ले आए। मिशेल उन्हें अपना ’गाॅड’ ही मानती है। उसी के शब्दों में-- ’गाॅड के नाम पर तो हम सभी अंधे हैं। आप में से किसी ने उसे देखा है या सुना है ? लेकिन मैंने छुआ है, उसे महसूस किया है।’
     
          नन्हे राजू की तरह मिशेल भी अपने क्राइस्ट अपने गाॅड को हंसाने की कोशिश करती है। जब अस्पताल में डाॅक्टर द्वारा मि0 सहाय को सिक्कड़ों में बांध दिया जाता है तो वह इसका विरोध करती है। दीक्षांत समारोह में वह औरों की तरह ड्रेस नहीं पहनती है, क्योंकि वह चाहती है कि इसे पहनकर सबसे पहले अपने टीचर के पास जाए। कारण, उसके टीचर उसे एक गे्रेजुएट के रूप में देखना चाहते थे।
      
            मिशेल मि0 सहाय के सामने खड़ी हो जाती है। मिशेल को मनोवांछित ड्रेस में सामने देखकर मि0 सहाय की याददाश्त लौट आती है और उनकी आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगते हैं। ये आंसू खुशी के आंसू हैं। इन दोनों की खुशी में हाथ बंटाने के लिए बादल भी बरस उठते हैं।
      
          फि़ल्म में पानी प्रकृति द्वारा बरसाया जाता है और मि0 सहाय द्वारा भी और यह प्रक्रिया एक नयी उम्मीद को, अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का आख्यान रचती है।
      
         जिस समय ’ब्लैक’ फि़ल्म बनकर आयी, फि़ल्म समीक्षक यही मान रहे थे कि फि़ल्म तो अच्छी है, पर चलेगी नहीं। किंतु फि़ल्म की यही अच्छाई एक दर्शक से दूसरे दर्शक तक मौखिक रूप में फैलती चली गई और दो-तीन हफ्ते बाद ही सही, फि़ल्म समीक्षकों को इसे हिट मानने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस संदर्भ में ’दैनिक हिन्दुस्तान’ के 2 अप्रैल 2005 के ’रंगोली’ परिशिष्ट में पृष्ठ संख्या-2 पर छपी ख़बर का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि फ़रवरी 2005 के महीने में 23 फि़ल्मों ने बड़े परदे का मुंह देखा किंतु इनमें से सफलता मिली संजय लीला भंसाली की ’ब्लैक’ को। बाद में इस फि़ल्म और इससे जुड़े कलाकारों को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इसे वर्ष 2006 में हिन्दी की श्रेष्ठ फीचर फि़ल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया। ’ब्लैक’ फि़ल्म ने फि़ल्मफेयर पुरस्कारों के अब तक के सारे रिकाॅर्ड तोड़ दिये। इससे पहले ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (1995) और ’देवदास’ (2002) को सबसे ज़्यादा दस फि़ल्मफेयर पुरस्कार मिले थे, ’ब्लैक’ के खाते में ग्यारह पुरस्कार आए। इसे राष्ट्रीय और फि़ल्मफेयर के साथ जी सिने एवार्ड, स्टार स्क्रीन एवार्ड और आईफा (IIFA) एवार्ड में भी श्रेष्ठ फि़ल्म के पुरस्कार से नवाजा गया। संजय लीला भंसाली को इस फि़ल्म के निर्देशन के लिए फि़ल्मफेयर, जी सिने एवार्ड, स्टार स्क्रीन एवार्ड और आईफा एवार्ड मिला। अभिनय के लिए अमिताभ बच्चन को श्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया; इसके अलावा उन्हें फि़ल्मफेयर, जी सिने एवार्ड, स्टार स्क्रीन एवार्ड और आईफा (IIFA) एवार्ड भी मिला। रानी मुखर्जी को श्रेष्ठ अभिनेत्री का फि़ल्मफेयर, जी सिने एवार्ड, स्टार स्क्रीन एवार्ड और आईफा (IIFA) एवार्ड मिला। आयेशा कपूर को श्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फि़ल्मफेयर, जी सिने एवार्ड, और आईफा (IIFA) एवार्ड मिला। यूरोप की टाइम मैगजीन ने वर्ष 2005 में विश्व की दस श्रेष्ठ फि़ल्मों की एक लिस्ट जारी की थी, जिसमें ’ब्लैक’ को पांचवां स्थान दिया गया। इस फि़ल्म को अमिताभ बच्चन, रानी मुखर्जी और खासकर आयशा कपूर के दमदार अभिनय के लिए याद किया जायेगा। आयशा कपूर अपने अभिनय के द्वारा अन्य सभी कलाकारों पर भारी पड़ी है। मध्यांतर से पूर्व की फि़ल्म वही अपने कांधों पर खींचती मालूम पड़ती है। उसने अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ा काम किया है।
      
           यह फि़ल्म संजय लीला भंसाली जी के उत्कृष्ट निर्देशन के लिए भी हमेशा याद की जायेगी। यद्यपि एक जगह उनसे चूक हो गई है। इस फि़ल्म में एक दृश्य है जब पहली बार नन्ही मिशेल, देवराज सहाय से मिलती है तो उसके चेहरे को अपनी उंगुलियों से छूती है। जब उसकी उंगुलियां देवराज सहाय की आंखों पर चढ़े चश्मे पर पड़ती है तो वह आश्चर्य से भर उठती है। पुनः वह अपनी आंखों को स्पर्श करती है और उसका चेहरा उदास हो जाता है। यहां मिशेल के चेहरे का भाव इस बात को प्रकट करता है कि देवराज सहाय की आंखों पर जिस तरह से चश्मा चढ़ा हुआ है, उसे भी अपनी आंखों पर लगाने के लिए चश्मा चाहिए। मि0 सहाय इस बात को समझ जाते हैं और उसे अपना चश्मा देते हैं। इस दृश्य में त्रुटि यह हुई है कि चूंकि मिशेल नेत्रहीन है अतः होना यह चाहिए था कि जब मि0 सहाय अपनी आंखों से चश्मा उतारकर मिशेल की आंखों पर पहना देते तो उस समय उसके चेहरे पर मुस्कुराहट फैल जाती, किंतु यहां भंसाली जी शायद जल्दी में थे तभी तो मि0 सहाय के द्वारा अपनी आंखों से चश्मा उतारने के समय ही मिशेल के चेहरे पर मुस्कान फैल जाती है, मानो वह उन्हें चश्मा उतारते हुए देख रही है।
         
        साथ ही एक सवाल यह भी उठता है कि इस फि़ल्म में जिस तरह से मि0 सहाय एक अंधी-गूंगी-बहरी बच्ची को सिखाने का प्रयास करते हैं क्या वह उचित है ? क्योंकि कभी-कभी वे छोटी बच्ची के सामने क्रूरता की हद को पार करते भी जान पड़ते हैं।
      
            साथ ही यह सवाल भी उठता है कि यदि मिशेल जैसी बच्चियां बड़े धनिक लोगों के घरों में जन्म लें तब तो उनके माता-पिता मि0 सहाय जैसे शिक्षक को हायर कर अपने बच्चे का सपना पूरा करने की कोशिश कर सकते हैं किंतु यदि ऐसे बच्चे किसी गरीब के यहां जन्म ले लें तो क्या होगा इनका ? क्योंकि वे मि0 सहाय जैसे शिक्षक को हायर नहीं कर पायेंगे। नतीजतन वह बच्चा गूंगा-बहरा-अंधा होने के साथ साथ मेंटली रिटायर्ड भी हो जायेगा।
       
          एक सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह से मि0 सहाय की मेहनत रंग लाती है और एक बच्ची ना सिर्फ़ जीना सीख लेती है, बल्कि ग्रेजुएशन भी पूरा करती है और अपनी आत्मकथा भी लिखती है क्या ऐसा संभव है ? यह फि़ल्म फ्लैशबैक में चलती है। मिशेल को मि0 सहाय छोड़कर चले गये हैं और वह टाइपराइटर पर अपनी आत्मकथा लिखती जाती है। ज्यों-ज्यों वह टाइपराइटर पर अपनी आत्म्कथा लिखती जाती है त्यों-त्यों फि़ल्म आगे बढ़ती जाती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि संजय लीला भंसाली अपनी फि़ल्म को हिट कराना चाह रहे थे और इसलिए उन्होंने फि़ल्म के अंत में सब कुछ अच्छा होते हुए दिखा दिया है ? आखि़र ’तीसरी कसम’ फि़ल्म के दुखांत अंत के कारण शैलेन्द्र को जो आर्थिक हानि हुई उसे कौन निर्देशक दोहराना चाहेगा ?
      
          इस सवाल के जवाब में यही कहा जा सकता है कि जिस तरह से मकड़ी बार-बार गिरने के बावजूद कई कोशिशों के बाद अपना घर बना ही लेती है। चींटी पहाड़ पर चढ़ जाती है, उसी तरह से यह संभव है कि कोई गूंगी-बहरी-अंधी लड़की पढ़-लिखकर ग्रेजुएशन कर ले और एक लेखिका भी बन जाये। संजय लीला भंसाली ने इस फि़ल्म का अंत आदर्शवादी नहीं रखा है, बल्कि वह यथार्थवादी है। हां, यह हो सकता है कि इस तरह के बच्चों की सफलता का औसत कम हो, लेकिन सफलता मिलेगी ही नहीं यह कहना गलत होगा। इस तरह के हाड़-मांस के व्यक्ति इस पृथ्वी पर कभी-कभी मिल जाते हैं जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर ऐसे-ऐसे कामों को अंजाम दे डालते हैं जिन्हें सुनकर लोग अपने दांतों तले उंगुलियां दबा लें। आखि़र कौन विश्वास करेगा कि हमारी भारतभूमि में ही हाड़-मांस का एक ऐसा व्यक्ति हुआ था जिसने अपने सत्य और अहिंसा के बल पर उस अंग्रेजी साम्राज्य के छक्के छुड़ा दिये थे जिसका कभी सूर्यास्त नहीं होता था। आखि़र भगत सिंह भी तो इस दुनिया में एक ही हुआ था जो अपने सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के लिए हंसते-हंसते फांसी पर झूल गया था। मदर टेरेसा भी तो एक ही थी जिन्होंने दीन-दुखियों की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था और हेलेना केलर भी तो इस दुनिया में एक ही हुई थीं जिन्होंने अंधी-गूंगी-बहरी होने के बावजूद ना सिर्फ़ अपना अध्ययन पूरा किया, बल्कि बाद में एक लेखिका भी बनीं।
      
           ’ब्लैक’ के बारे में एक आलोचना यह भी की जा सकती है कि यह आम दर्शकों द्वारा नापसंद किये जाने लायक फि़ल्म है क्योंकि इसमें आम मुंबइया फि़ल्मों की तरह के लटके-झटके नहीं हैं। वैसे भी भारतीय फि़ल्मों का एक बड़ा दर्शक निम्न वर्ग से ही होता है और जो फि़ल्म इस वर्ग के लोगों द्वारा पसंद कर ली जाती है, वह निश्चित ही अच्छा बिजनेस करती है। वैसे यह ’ब्लैक’ फि़ल्म की खूबी भी मानी जा सकती है और यही मानी जानी चाहिए। वैसे भी सभी फि़ल्में सभी लोगों के लिए नहीं होती हैं, आखि़र अच्छा साहित्य कितने लोगों द्वारा पढ़ा जाता है ? साहित्यिक पत्रिकाएं मुश्किल से अपना खर्च निकाल पाती हैं जबकि गैर-साहित्यिक पत्रिकाएं अत्यधिक संख्या में मुनाफा कमाती हैं। लेकिन समाज को मशाल दिखाने का काम तो अच्छा साहित्य ही करता है।
      
             संजय लीला भंसाली जी की ’ब्लैक’ एक अच्छे साहित्य की तरह है जो ना सिफ़ दर्शनीय है बल्कि विचारणीय भी है। आने वाले समय में जब भी हिंदी फि़ल्मों का इतिहास लिखा जायेगा उसमें एक अच्छी यादगार फि़ल्म के रूप में ’ब्लैक’ की चर्चा अवश्य की जायेगी। जब भी अमिताभ बच्चन, रानी मुखर्जी और आयशा कपूर के अभिनय की चर्चा होगी ’ब्लैक’ की चर्चा ज़रूर होगी। आने वाले समय में संजय लीला भंसाली को अगर किसी एक फि़ल्म के लिए याद किया जायेगा तो वह ’ब्लैक’ ही है।
      
          ’ब्लैक’ जैसी फि़ल्में कभी-कभी ही बनती हैं। यह एक ऐसी फि़ल्म है जो शब्द और इसके अर्थ तथा इसकी सामथ्र्य एवं शक्ति को प्रदर्शित करती है। यह बताती है कि शब्द का अर्थ जानकर ही अंधेरे की दुनिया से बाहर निकला जा सकता है। यह फि़ल्म सिखाती है कि दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं और दूसरों के लिए जीने को जीना कहते हैं। ’ब्लैक’ फि़ल्म दर्शकों में प्रेरणा का संचार करती है।


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