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Monday, 5 May 2014

डायरी 5-5-2014: जनतंत्र एक भ्रम है



     मेरे किसी मित्र ने एक बार मुझसे कहा, ’’पहले यह कहा जाता था कि जैसी राजा वैसी प्रजा, किन्तु आज के समय में यह कहावत चरितार्थ होनी चाहिए कि जैसी प्रजा वैसा राजा।’’ इसी तरह से एक बार किसी आईएएस अधिकारी से भेंट हुई। बातों ही बातों में जब सरकार और नेताओं के भ्रष्टाचार की बात उठी तो उसने कहा कि सरकार को क्यों दोष देते हो, दोषी तो जनता है आखि़र वही तो वोट देकर सरकार बनाती है। मेरे उस मित्र और आईएएस अधिकारी ने बात पते की कही थी, लेकिन सवाल उठता है कि यह बात कितनी सही है ?  
 

        अक्सर पान की दुकान पर, चाय की अड़ी (अड्डे) पर; आॅटो, बस या  रेल में आमलोग गरमागरम बहस करते दिख जाएंगे। सरकार, नेता, नौकरशाह, समाज, परिवार से होते हुए वे अन्त में इस निष्कर्स पर पहुंचते हैं कि आम लोग ही दोषी हैं। जनता ही सारी बुराइयों की जड़ है। लोग यहां तक कहते मिल जाएंगे कि हम एक जनतंत्र में रह रहे हैं और लोगों को यहाँ तक अधिकार है कि वे चुनाव में खड़े होकर अपनी सरकार बना सकते हैं, लेकिन जनता कुछ नहीं करती, इसलिए सब जनता का ही दोष है। 
    

        अगर ऊपरी तौर पर देखा जाए तो ये सारी बातें आपको सही जान पडे़ंगी, लेकिन इसकी तह तक पहुंचने की ज़रूरत है कि क्या जनता ही दोषी है ? आइए इसी मुद्दे पर बात करते हैं। सबसे पहले इस सवाल को समझना ज़रूरी है कि क्या इस जनतंत्र में जनता ही सबकुछ है ? क्या जनता ही सरकार बनाती है ? अगर ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि जिस जनतंत्र की बात अक्सर की जाती है वह दरअसल भ्रम है और भ्रम के सिवा कुछ नहीं। कैसे ? मैं अपनी बात सिद्ध करता हूँ।
 

          आर0 पी0 एक्ट, 1951 के सेक्शन 34 1(ए) (Section 34  1 (a) of R.P. Act, 1951)  के अनुसार लोकसभा चुनाव में हिस्सा लेने के लिए प्रति उम्मीदवार को जमानत के रूप में 25,000 रुपये जमा करने पड़ते हैं। अगर कोई उम्मीदवार अनुसूचित जाति या जनजाति से है तो उसे 12,500 रुपये जमा करने होंगे। इसी तरह से आर0 पी0 एक्ट, 1951 के सेक्शन 34 1(बी) (Section 34 1 (b) of R.P. Act, 1951) के अनुसार विधानसभा चुनाव के लिए जमानत राशि 10,000 रुपये है। अनुसूचित जाति जनजाति के उम्मीदवार के लिए इसकी राशि 5,000 रुपये है।
    

       इस नियम के बाद दो रिपोर्टों पर अपनी नज़र डालते हैं। यूपीए के नेतृत्व वाली केन्द्रीय सरकार में योजना आयोग ने 24 जुलाई 2013 को एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में 27.20 रुपये प्रति दिन और शहरी क्षेत्र में 33 रुपये प्रति दिन कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इस रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 816.00 रुपये और शहरी क्षेत्र में 990.00 रुपये प्रति माह कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इसी तरह की एक रिपोर्ट गुजरात के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग (Food and Civil Supplies Department)  ने 3 फ़रवरी 2014 को जारी की है, जिसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 10.80 रुपये और शहरी क्षेत्र में 16.70 रुपये प्रति दिन कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इस रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 324 रुपये प्रति महीने कमाने वाला और शहरी क्षेत्र में 501 रुपये प्रति महीने कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है।
    

       प्रति व्यक्ति आय और चुनाव में खड़े होने के लिए जमा की जाने वाली राशि पर ध्यान दें तो पहला ख़याल यही आता है कि 1000 रुपये से भी कम कमाने वाला व्यक्ति क्या कभी लोकतंत्र का हिस्सा बन सकता है ? कहने के लिए तो हम एक लोकतंत्र में निवास कर रहे हैं किन्तु क्या हम उसका हिस्सा बन सकते हैं ? यह तो रही चुनाव में खड़े होने के लिए न्यूनतम राशि की बात; इसके बाद प्रचार में होने वाले खर्च की बात करें तो एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह कल्पना से परे है। यहाँ सवाल उठता है कि जब लोकसभा चुनाव में खड़े होने की न्यूनतम राशि केन्द्र सरकार द्वारा घोषित प्रति व्यक्ति वार्षिक आय से ज़्यादा है तो फिर यह कैसे मान लिया जाए कि हम एक लोकतंत्र में रह रहे हैं ! यानी ध्यान से देखेंगे तो यही पाएंगे कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। यानी हम भले ही यह कह लें कि हम एक जनतंत्र में रह रहे हैं किन्तु हमारी भागीदारी इसमें सिर्फ़ वोट देने तक ही सीमित कर दी गई है। एक साजिश के तहत पिछले कई वर्षों में चुनाव को इतना महंगा बना दिया गया है कि एक सामान्य व्यक्ति इसके बारे में सोच तक नहीं सकता।
      

        अगर राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो जिस तरह से एक समय राजा का बेटा ही राजा बनता था, उसी तरह से आज के समय में लोकतंत्र को इस तरह से गढ़ा जा रहा है कि  वह बाहर-बाहर से देखने में भले ही जनता का शासन दिखाई पडे़, किन्तु वास्तविक रूप में वह राजतंत्र ही है जहाँ कुछ खास लोगों की जेब में ही लोकतंत्र की चाबी पड़ी रहती है। अक्सर नेताओं द्वारा लोगों को एक भ्रम में रखा जाता है, और जनता भी इस बात को स्वीकार करके खुश हो लेती है कि वही सरकार बनाती है।
      

        जनतंत्र एक विचार है और यह पूरी तरह से तभी क्रियान्वित हो सकता है जब आर्थिक समानता आए। जब प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार मिले कि वह चुनाव में खड़े होकर सत्ता का हिस्सा बन सकता है तभी पूरी तरह से जनतंत्र की स्थापना हो सकती है। आर्थिक समानता के अभाव में जनतंत्र की परिकल्पना एक तरह से भ्रम ही है। यानी कि यह कहना कि सरकार का चुनाव जनता करती है यह एक तरह से भ्रम है। जनता सरकार नहीं चुनती है; बल्कि राजनीतिक पार्टियों ने जनता के अधिकार को सिर्फ़ वोट देने तक ही सीमित कर एक तरह से राजतंत्र का निर्माण कर दिया है।
       

          एक बात और कई बार कोई राजनीतिक पार्टी अपने एक नेता को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर देती है और लोगों से उसके नाम पर वोट देने के लिए कहती है। सारे देश में जहाँ से उस पार्टी के उम्मीदवार खड़े होते हैं वहां वहां पर प्रधनमंत्री प्रत्याशी के नाम पर वोट की मांग की जाती है। संविधान के अनुसार चुनाव लोकसभा या विद्यानसभा के गठन के लिए होता है न कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के चयन के लिए। प्रधानमंत्री के नाम पर वोट मांगकर विभिन्न पार्टियां एक कैम्पेन तैयार करने की कोशिश करती हैं। राजनीतिक पार्टियां प्रधानमंत्री के नाम पर वोट मांगकर आमजनता का ध्यान अपने क्षेत्र के लोकसभा उम्मीदवार की योग्यता से हटाने की कोशिश करती है। राजनीतिक पार्टियां पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया के जरिए अपने प्रधानमंत्री प्रत्याशी की एक लोकप्रिय छवि गढ़ने की कोशिश करती है; मीडिया में बार-बार अपने नेता की छवि दिखाकर इस बात का झूठा प्रचार करने की कोशिश करती है कि उनके नेता की लहर है, और आपने हमारी पार्टी को वोट नहीं दिया तो फिर आप अपना एक वोट बर्बाद कर रहे हैं।