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Saturday, 14 June 2014

कहानी

प्रमोद कुमार बर्णवाल


                                      
                                                                जादू 

                                                                                       
                                                                             -- प्रमोद कुमार बर्णवाल                        
                                      



  
दरवाज़े  के खुलते ही उनमें हरकत हुई थी।

वे कईं थीं। कुछ ऊँची छत तक छूती आलमारियों पर सवार थीं। कुछ दीवारों पर बने हुए रैक पर। कुछ कुर्सियों पर, कुछ मेज पर पड़ी थीं। कुछ मेजों और कुर्सियों के नीचे। कुछ नंगे फर्श पर।
कुछ ताज़गी के सुवास से भरी थीं। सफेद। कुछ थोड़ा सफेद, थोड़ा पीलापन लिए। कुछ फटी हुई, मुड़ी - तुड़ी, छिद्रित। कुछ बिल्कुल पीली पड़ गईं थीं। कुछ ने अपने भीतर धूल की तहें समेट ली थीं। कुछ ने दीमकों को आश्रय दिया था, कुछ ने मकड़ी के जाले को। कुछ जीर्ण - शीर्ण हो गईं थीं। कुछ इतनी कि हाथ लगाते ही टूट कर नीचे गिरने लगे।

        वे दिखने में चिडि़यों के समान बहुत छोटी - सी थीं, इतनी कि अगर ब्रह्मांड का नक्शा बनाया जाये तो उसमें उनका अस्तित्व विलीन हो जाए ; लेकिन आश्चर्य यह था कि  वे अपने भीतर पूरे ब्रह्मांड को समेटे हुए थीं।
वे सभी उत्सुक थीं, और दरवाज़ा खोलकर अन्दर कदम रखने वाले जादूगर को बहुत अरमानों से देख रही थीं। जादूगर बहुत भूखा और बेचैन था, उसके चेहरे पर असंतुष्टि के भाव थे, जाने कौन - सी बातें उसे रह रहकर परेशान कर रहीं थीं। उसका सिर नीचे झुका हुआ था और उसमें आत्मविश्वास की कमी साफ साफ झलक रही थी।

        भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर ने बड़ी उम्मीद के साथ एक की ओर अपने हाथ बढ़ाए।
       
       जादूगर ने जिसकी ओर अपने हाथ बढ़ाए थे, उसकी खुशी का कोई पारावार ही न रहा ; वह बहुत खुश हो गई और चिडि़या की तरह उसने अपने थोड़े सफेद, थोड़े पीले पंख फड़फड़ाने शुरू कर दिए।
जादूगर के हाथों का सुखद स्पर्श पाते ही उस चिडि़या ने अपने पंखों को फड़फड़ाना बन्द कर दिया ; और शान्तचित्त होकर जादूगर के अगले कदम का इंतज़ार करने लगी। जादूगर ने उसके पहले पंख पर अपनी नज़रें डालीं और वहाँ उगे मातियों को निहारने लगा।

        अपने पहले पंख पर जादूगर की नज़रें पड़ते ही उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और मन  ही मन खुदा से प्रार्थना करने लगीं।

      कुछ देर तक पहले पंख पर उगे मोतियों को निहारने के बाद जादूगर ने उसे आलमारी में वहीं रख दिया जहाँ से उसे उठाया था।

       जादूगर द्वारा फिर से आलमारी में रख दिए जाने पर वह बहुत उदास हो गई। खुदा के द्वारा उसकी प्रार्थना ठुकरा दी गई थी, मन में यह ख़याल आते ही उसे और भी बुरा लगने लगा ; वह आत्मग्लानी से भर गई। उसका हृदय शोक से भर गया ; शोक में वह अपना संतुलन ठीक से रख नहीं पा रही थी। अचानक उसके कदम लड़खड़ाए, और वह तेजी से आलमारी से नीचे फर्श की ओर गिरने लगी।

     नीचे गिरने पर उसका क्या अंजाम होगा, इसकी कल्पना कर वह सिहर गई। उसने डर से अपने सारे पंख जोर - जोर से फड़फड़ाने शुरू कर दिए। जोर से आवाज़ करते हुए वह फर्श पर गिर पड़ी ; गिरते समय वह फर्श पर कुछ दूर तक घिसटती चली गई। उसके कुछ पंख टूट गए थे ; अपने टूटे पंखों को देखकर वह दुख से भर गई। उसने एक नज़र जादूगर पर डाली और बहुत ही हसरत से उसे देखने लगी।
लेकिन उसे मायूस होना पड़ा, जादूगर ने नज़रें उसकी ओर से फेर लीं थीं, और दूसरी आलमारी की ओर अपने कदम बढ़ा दिए थे।
      
            जादूगर  दूसरी आलमारी की ओर बढ़ा। जादूगर को अपनी ओर बढ़ते देख उस आलमारी पर बसेरा करने वालीं सारी चिडि़या अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। वे बहुत ही आशा से जादूगर को देखने लगीं। जादूगर ने एक सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या की ओर अपने हाथ बढ़ा दिए , और उसे अपनी हथेलियों में भर लिया। जादूगर के द्वारा स्पर्श किए जाने के कारण सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या गर्व से भर गई, और थोड़ा अहं से भी।

-----गर्व से इसलिए क्योंकि अन्य चिडि़या  उसे अदा कदा चिढ़ाती रहती थीं कि उसका कोई कद्रदान नहीं। अनेक जादूगर उस आलमारी के पास से गुजरते, वे अन्य को स्पर्श करते, किन्तु एक लम्बे समयांतराल से उस सफेद - पीले पंख वाले चिडि़या की ओर किसी ने देखा तक नहीं था।

-----अहं से इसलिए क्योंकि लम्बे समयांतराल से उसे किसी ने स्पर्श नहीं किया था, और आज जब किसी ने उसे स्पर्श किया तो उसे लगा कि उसका आज भी महत्व है। उसके बिना काम नहीं चल सकता। वह बेकार नहीं हुई है।

         और यह भाव आते ही उसने अपने सारे पंख आपस में जोर से चिपका लिए।
        जादूगर ने उस चिडि़या का एक पंख खोलने की कोशिश की, पर वह खोल नहीं सका। जादूगर ने फिर कोशिश की, लेकिन चिडि़या तब भी नहीं मानी। जादूगर ने अपनी उंगुलियों का दबाव डाला, लेकिन चिडि़या भाव खाती रही, उसने अपने पंख नहीं खोले। तब जादूगर ने हाथ की उंगुली अपने मुँह में डाली ; और लार से अपनी उंगुली गीली करने लगा। उसने अपनी गीली उंगुली से पंख को स्पर्श किया ; चिडि़या की आँखें भर आईं, और उसने अपने पंख खोल दिए। एक पंख को निहार लेने के बाद जादूगर ने दूसरे पंख को खोलने की कोशिश की ; चिडि़या ने खुशी खुशी अपना दूसरा पंख जादूगर के सामने खोल दिए। जादूगर ने चिडि़या के कुछ और पंख खोलने की कोशिश की ; चिडि़या खुशी खुशी जादूगर का साथ देती रही।
       
          कुछ पंखों को निहार लेने के बाद जादूगर ने उस चिडि़या को पुन: आलमारी में रख दिया। वह चिडि़या खुशी से भर गई थी, वर्षों बाद किसी ने उसे स्पर्श किया था। उसने गर्व से अपने अगल बगल के चिडि़यों को देखा। अगल बगल की चिडि़या उसे ईष्र्या से देख रहीं थीं। अगल बगल की चिडि़यों में से एक झक्क सफेद पंख वाली चिडि़या बहुत ही शर्मिन्दा होने लगी थी, ऐसा इसलिए क्योंकि सफेद - पीले पंख वाले चिडि़या को सबसे ज़्यादा वही चिढ़ाती थी। एक बार तो झक्क सफेद पंखों वाली चिडि़या  ने सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या पर व्यंग्य करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि ’’तुम बूढ़ी हो चुकी हो, तुम आउट आॅफ सिलेबस हो।’’ 

    इस पर सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या ने अपना बचाव करते हुए कहा था, ’’नहीं, ऐसा नहीं है। कोई न कोई तो ज़रूर होगा जो मुझमें उगे मोतियों को चुगना चाहेगा ; कोई न कोई मेरे मोतियों का कद्रदान ज़रूर होगा।’’

झक्क सफेद पंखों वाली चिडि़या ने जोर - जोर से हँसते हुए कहा, ’’तुम भ्रम में जी रही हो, तुम्हारा ज़माना लद गया। अब बाज़ार में अनेक नई चिडि़या आ गईं हैं, उनकी मांग ज़्यादा है, तुम्हें कोई नहीं पूछेगा।’’

सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या ने कहा, ’’मैं ऐसा नहीं मानती, तुमने मुझसे ज़्यादा दुनियाँ नहीं देखी है।’’

’’अगर ऐसा है तो क्यों नहीं इस बात पर शर्त लग जाए।’’

’’ठीक है, बताओ क्या शर्त लगाती हो ?’’

’’अगर आज के बाद कोई तुम्हें स्पर्श करता है तो फिर मैं तुम्हें अपना चेहरा कभी नहीं दिखाऊँगी।’’

’’ठीक है।’’

         सफेद - पीले पंखों वाली चिडि़या ने झक्क सफेद पंखों वाली चिडि़या को बहुत ही गर्व से देखा। झक्क सफेद पंखों वाली चिडि़या को उसकी नज़रें बर्दाश्त नहीं हो पा रहीं थीं, उसने नीचे फर्श की ओर देखा, और छलांग लगा दी। वह अंधेरे में कहीं खो गई।
     
         इन सब बातों से अन्जान जादूगर ने अब तक आलमारी में रखी दूसरी चिडि़या को उठा लिया था, और उसमें उगे मोतियों को निहारने लगा। दूसरी चिडि़या बहुत खुश हो गई।
   
           जादूगर ने दूसरी चिडि़या के कुछ पंखों को उलट पलट कर देखा, और फिर उसे आलमारी में रख दिया। दूसरी चिडि़या सिसकिया लेने लगी। दरअसल जादूगर ने उसे आलमारी के सबसे ऊपर वाले रैक से उठाया था, किन्तु वहाँ रखने की बजाय उसने उसे नीचे के रैक पर रख दिया। दूसरी चिडि़या तीन महीने पहले किसी और आलमारी में रहा करती थी, उससे दो महीने पहले किसी और आलमारी में ; वह बार - बार कुछ जादूगरों की लापरवाही के कारण इधर से उधर विस्थापित होती रही थी। कई जादूगर थे जो दूसरी चिडि़या के कद्रदान थे, वे उसे सहेज कर रखना चाहते थे। वे कई बार उसे ढूंढते हुए उसके पुराने घर में जाते रहे थे, किन्तु उसके न मिलने पर  उदास होकर किसी और चिडि़या से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करने लगे थे। 
         
         जादूगर  एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने एक पुरानी चिडि़या को उठाया। पुरानी चिडि़या जादूगर का स्पर्श पाते ही प्रसन्न हो गई।
जादूगर ने पुरानी चिडि़या के कुछ पंखों को उलटा पलटा और खूब प्रसन्न हो गया। जादूगर को प्रसन्न होते देख पुरानी चिडि़या को यह समझते देर नहीं लगी कि उसके पंखों में वैसे मोती उगे हैं जिनकी जादूगर को तलाश थी।
      
           अचानक जादूगर उदास हो गया। पुरानी चिडि़या को जादूगर की उदासीनता का कारण समझने में देर नहीं लगी ; वह भी उदास हो गई। जादूगर ने पुरानी चिडि़या को उठाया और वहीं रख दिया जहाँ से उसे उठाया था। पुरानी चिडि़या ने कहना चाहा, ’’इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, कुछ दिनों पूर्व एक और जादूगर आया था, उसने मुझे उठाया, और अपने काम के पंख तोड़ कर ले गया, मैं असहाय भाव से उसे देखती रही, मैं कुछ भी नहीं कर सकी।’’
          
          जादूगर एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने एक चिडि़या को उठाया, और उसके कुछ पंख देखने लगा। जादूगर जैसे जैसे चिडि़या के पंख देखता जाता था, वैसे वैसे उसकी उंगुलियों पर धूल लगता जाता था।
      
         चिडि़या जादूगर के स्पर्श से खुश तो हो रही थी पर वह थोड़ी शर्मिन्दगी भी महसूस कर रही थी, वह जादूगर से कहना चाह रही थी, ’’इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, मेरी देखरेख और साफ - सफाई की जि़म्मेदारी जिसपर है वह अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाता, तो इसमें मेरी क्या ग़लती ?’’
        
          धूल लगे पंखों से एक पुरानी गंध निकल रही थी। पुरानी गंध जादूगर के नथुनों से टकराई, और उसे जोर की छींक आ गई। जादूगर ने जल्दी से धूल लगे पंखों वाली चिडि़या को पुन: आलमारी में रख दिया और वहाँ से थोड़ी दूर हट गया। उसने अपना रूमाल निकाला, अपने हाथों में पड़े धूल को झाड़ा और अपनी नाक साफ करने लगा।
       
           जादूगर एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने उस आलमारी से एक चिडि़या निकाला, और उसके पंखों का अवलोकन करने लगा। उसने चिडि़या के एक एक पंख को देखा। अचानक जादूगर बहुत खुश हो गया। चिडि़या के पंख थोड़े पीले पड़ गए थे ; किन्तु सारे के सारे पंख सही सलामत थे। जादूगर ने खुशी से चिडि़या को चूम लिया। चिडि़या थोड़ा शर्माई फिर गर्व से भर गई।
    
         जादूगर ने उस थोड़े पीले पड़ गए चिडि़या को बहुत प्यार से उठाया और कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा। अन्य चिडि़या उस थोडे़ पीले पड़ गए चिडि़या को जादूगर के सिर पर मान सम्मान के साथ जाते हुए देखने लगी थीं, और मन  ही मन उसकी किस्मत से ईष्र्या करने लगी थीं। जादूगर कमरे से निकल गया, और सारी चिडि़या उदास हो गईं। वे सब शान्त हो गईं, और इंतज़ार करने लगीं कि कभी न कभी, कोई न कोई जादूगर उस कमरे में आएगा जो उनका कद्रदान होगा ; और वे चिडि़या भी अपने कद्रदानों के सिर पर मान सम्मान के साथ सवार होकर सैर को निकल जाएंगी।
        
          भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर कमरे से निकलकर एक ओर को गया। वहाँ अनेक मेजें और कुर्सियां लगी हुईं थीं। वहाँ पहले से अनेक छोटे बडे़ जादूगर बैठे हुए थे, तो कुछ कुर्सियां खाली भी थीं। भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर एक खाली कुर्सी पर बैठ गया, और सामने की मेज पर अपने साथ लाए चिडि़या को रख दिया। जादूगर ने बहुत प्यार और ध्यान से चिडि़या के पंखों को उलटना पलटना शुरू किया। चिडि़या के सारे पंखों पर अनेक मोती उगे हुए थे ; जादूगर ने एक पंख खोला और उसमें स्थित सारे मोतियों को खाने लगा, फिर उसने दूसरा पंख खोला और उसमें स्थित मोतियों को खाने लगा। आश्चर्यजनक यह था कि भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर जितने मोती खाता जाता था, उतने मोती फिर से पंखों पर उगते जाते थे।
        
           चिडि़या वर्षों से लोगों की सेवा करती आई थी। वह लोगों को सभ्य, सुसंस्कृत, और जानकारी से परिपूर्ण करती रही थी। किन्तु कई लोग चिडि़या के इस सेवा - भाव से परेशान भी हुए थे ; कई आतताइयों, हुड़दंगियों, और तानाशाहों ने उसे नष्ट भ्रष्ट करने का प्रयास किया ; कई ने चिडि़यों  को उनके आलय में ही जलाकर मार डालने का प्रयास किया, किन्तु तब भी चिडि़यों का अस्तित्व बचा रहा। आतताइयों ने चिडि़यों पर बार बार अत्याचार किए ; किन्तु वे चिडि़यों का कुछ बिगाड़ नहीं पाएं। चिडि़यों पर जितना अत्याचार बढ़ा उनके चाहने वाले भी बढ़ते गए।
        
            इधर कुछ समय से चिडि़या एक अजीब संकट से गुजर रहीं थीं। इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों के विकास और उनकी लोकप्रियता ने चिडि़यों के सामने एक नया प्रतिद्वंद्वी खड़ा कर दिया था। कुछ बुद्धिजीवी तो यहाँ तक कहने लगे थे कि अब चिडि़यों का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है, वे जल्द ही नष्ट हो जाएंगी।
     
            भूखा - बेचैन - असंतुष्ट जादूगर चिडि़या के पंखों को उलटता पलटता रहा और उसमें स्थित मोतियों को खाता रहा। जादूगर शब्दों और ज्ञान का जादूगर था, वह लोगों के बीच अपनी वक्तृत्व शैली के लिए प्रसिद्ध था, उसे विभिन्न गोष्ठियों में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता। उससे जब भी कोई सवाल किया जाता वह मुस्कुराते हुए आत्मविश्वास के साथ उसका जवाब देता। वह ऐसा जवाब देता कि लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते थे। उसके पास राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक सभी तरह के जवाब होते थे। वह जब भी किसी के पूछे सवाल का जवाब नहीं दे पाता, चिडि़यों के पास चला आता। हाल ही में किसी मित्र ने उससे कोई सवाल किया था, उस समय वह उसका जवाब नहीं दे पाया था और तब से ही वह परेशान था, उसे अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती महसूस हुई थी। इससे उसका आत्मविश्वास थोड़ा कम हुआ था। उसी सवाल का जवाब पाकर अपनी इज्जत बचाने के लिए वह इस समय चिडि़या की शरण में आया था।
       
              जादूगर के पास इलेक्ट्राॅनिक माध्यम भी था, और वह जब तब उसका प्रयोग भी करता था। इलेक्ट्राॅनिक माध्यम को रखना और सहेजना सहज और आसान था, वह कम जगह भी घेरती थी ; तब भी कुछ था जो उसे चिडि़यों के पास आने के लिए आकर्षित करता था।
      
             जादूगर मोतियों को लगातार खाए जा रहा था। वह जैसे जैसे मोतियों को खाए जा रहा था उसकी भूख मिटती जा रही थी, उसकी बेचैनी घट रही थी। वह मित्र द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब से रू ब रू होने लगा था। उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा, उसका चित्त ग़ज़ब का शान्त होने लगा। चिडि़या के पंखों के सुखद स्पर्श ने उसमें जादू भर दिया था।
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 प्रमोद कुमार बर्णवाल                        

प्रकाशन:- 1. कादम्बिनी, वागर्थ, परिकथा, युद्धरत आम आदमी, कथादेश में कहानियां प्रकाशित।
          2. कादम्बिनी, वागर्थ, परिकथा, प्रगतिशील वसुधा, शब्दयोग, कथाक्रम में लेख प्रकाशित।

सम्मान: पहली कहानी ’जिंदगी या मौत ’ कादम्बिनी द्वारा आयोजित युवा कहानी प्रतियोगिता 2003 में सांत्वना पुरस्कार से सम्मानित।                                          
सम्प्रति:- बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी।                                                         

Monday, 5 May 2014

डायरी 5-5-2014: जनतंत्र एक भ्रम है



     मेरे किसी मित्र ने एक बार मुझसे कहा, ’’पहले यह कहा जाता था कि जैसी राजा वैसी प्रजा, किन्तु आज के समय में यह कहावत चरितार्थ होनी चाहिए कि जैसी प्रजा वैसा राजा।’’ इसी तरह से एक बार किसी आईएएस अधिकारी से भेंट हुई। बातों ही बातों में जब सरकार और नेताओं के भ्रष्टाचार की बात उठी तो उसने कहा कि सरकार को क्यों दोष देते हो, दोषी तो जनता है आखि़र वही तो वोट देकर सरकार बनाती है। मेरे उस मित्र और आईएएस अधिकारी ने बात पते की कही थी, लेकिन सवाल उठता है कि यह बात कितनी सही है ?  
 

        अक्सर पान की दुकान पर, चाय की अड़ी (अड्डे) पर; आॅटो, बस या  रेल में आमलोग गरमागरम बहस करते दिख जाएंगे। सरकार, नेता, नौकरशाह, समाज, परिवार से होते हुए वे अन्त में इस निष्कर्स पर पहुंचते हैं कि आम लोग ही दोषी हैं। जनता ही सारी बुराइयों की जड़ है। लोग यहां तक कहते मिल जाएंगे कि हम एक जनतंत्र में रह रहे हैं और लोगों को यहाँ तक अधिकार है कि वे चुनाव में खड़े होकर अपनी सरकार बना सकते हैं, लेकिन जनता कुछ नहीं करती, इसलिए सब जनता का ही दोष है। 
    

        अगर ऊपरी तौर पर देखा जाए तो ये सारी बातें आपको सही जान पडे़ंगी, लेकिन इसकी तह तक पहुंचने की ज़रूरत है कि क्या जनता ही दोषी है ? आइए इसी मुद्दे पर बात करते हैं। सबसे पहले इस सवाल को समझना ज़रूरी है कि क्या इस जनतंत्र में जनता ही सबकुछ है ? क्या जनता ही सरकार बनाती है ? अगर ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि जिस जनतंत्र की बात अक्सर की जाती है वह दरअसल भ्रम है और भ्रम के सिवा कुछ नहीं। कैसे ? मैं अपनी बात सिद्ध करता हूँ।
 

          आर0 पी0 एक्ट, 1951 के सेक्शन 34 1(ए) (Section 34  1 (a) of R.P. Act, 1951)  के अनुसार लोकसभा चुनाव में हिस्सा लेने के लिए प्रति उम्मीदवार को जमानत के रूप में 25,000 रुपये जमा करने पड़ते हैं। अगर कोई उम्मीदवार अनुसूचित जाति या जनजाति से है तो उसे 12,500 रुपये जमा करने होंगे। इसी तरह से आर0 पी0 एक्ट, 1951 के सेक्शन 34 1(बी) (Section 34 1 (b) of R.P. Act, 1951) के अनुसार विधानसभा चुनाव के लिए जमानत राशि 10,000 रुपये है। अनुसूचित जाति जनजाति के उम्मीदवार के लिए इसकी राशि 5,000 रुपये है।
    

       इस नियम के बाद दो रिपोर्टों पर अपनी नज़र डालते हैं। यूपीए के नेतृत्व वाली केन्द्रीय सरकार में योजना आयोग ने 24 जुलाई 2013 को एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में 27.20 रुपये प्रति दिन और शहरी क्षेत्र में 33 रुपये प्रति दिन कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इस रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 816.00 रुपये और शहरी क्षेत्र में 990.00 रुपये प्रति माह कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इसी तरह की एक रिपोर्ट गुजरात के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग (Food and Civil Supplies Department)  ने 3 फ़रवरी 2014 को जारी की है, जिसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 10.80 रुपये और शहरी क्षेत्र में 16.70 रुपये प्रति दिन कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। इस रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 324 रुपये प्रति महीने कमाने वाला और शहरी क्षेत्र में 501 रुपये प्रति महीने कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है।
    

       प्रति व्यक्ति आय और चुनाव में खड़े होने के लिए जमा की जाने वाली राशि पर ध्यान दें तो पहला ख़याल यही आता है कि 1000 रुपये से भी कम कमाने वाला व्यक्ति क्या कभी लोकतंत्र का हिस्सा बन सकता है ? कहने के लिए तो हम एक लोकतंत्र में निवास कर रहे हैं किन्तु क्या हम उसका हिस्सा बन सकते हैं ? यह तो रही चुनाव में खड़े होने के लिए न्यूनतम राशि की बात; इसके बाद प्रचार में होने वाले खर्च की बात करें तो एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह कल्पना से परे है। यहाँ सवाल उठता है कि जब लोकसभा चुनाव में खड़े होने की न्यूनतम राशि केन्द्र सरकार द्वारा घोषित प्रति व्यक्ति वार्षिक आय से ज़्यादा है तो फिर यह कैसे मान लिया जाए कि हम एक लोकतंत्र में रह रहे हैं ! यानी ध्यान से देखेंगे तो यही पाएंगे कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। यानी हम भले ही यह कह लें कि हम एक जनतंत्र में रह रहे हैं किन्तु हमारी भागीदारी इसमें सिर्फ़ वोट देने तक ही सीमित कर दी गई है। एक साजिश के तहत पिछले कई वर्षों में चुनाव को इतना महंगा बना दिया गया है कि एक सामान्य व्यक्ति इसके बारे में सोच तक नहीं सकता।
      

        अगर राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो जिस तरह से एक समय राजा का बेटा ही राजा बनता था, उसी तरह से आज के समय में लोकतंत्र को इस तरह से गढ़ा जा रहा है कि  वह बाहर-बाहर से देखने में भले ही जनता का शासन दिखाई पडे़, किन्तु वास्तविक रूप में वह राजतंत्र ही है जहाँ कुछ खास लोगों की जेब में ही लोकतंत्र की चाबी पड़ी रहती है। अक्सर नेताओं द्वारा लोगों को एक भ्रम में रखा जाता है, और जनता भी इस बात को स्वीकार करके खुश हो लेती है कि वही सरकार बनाती है।
      

        जनतंत्र एक विचार है और यह पूरी तरह से तभी क्रियान्वित हो सकता है जब आर्थिक समानता आए। जब प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार मिले कि वह चुनाव में खड़े होकर सत्ता का हिस्सा बन सकता है तभी पूरी तरह से जनतंत्र की स्थापना हो सकती है। आर्थिक समानता के अभाव में जनतंत्र की परिकल्पना एक तरह से भ्रम ही है। यानी कि यह कहना कि सरकार का चुनाव जनता करती है यह एक तरह से भ्रम है। जनता सरकार नहीं चुनती है; बल्कि राजनीतिक पार्टियों ने जनता के अधिकार को सिर्फ़ वोट देने तक ही सीमित कर एक तरह से राजतंत्र का निर्माण कर दिया है।
       

          एक बात और कई बार कोई राजनीतिक पार्टी अपने एक नेता को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर देती है और लोगों से उसके नाम पर वोट देने के लिए कहती है। सारे देश में जहाँ से उस पार्टी के उम्मीदवार खड़े होते हैं वहां वहां पर प्रधनमंत्री प्रत्याशी के नाम पर वोट की मांग की जाती है। संविधान के अनुसार चुनाव लोकसभा या विद्यानसभा के गठन के लिए होता है न कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के चयन के लिए। प्रधानमंत्री के नाम पर वोट मांगकर विभिन्न पार्टियां एक कैम्पेन तैयार करने की कोशिश करती हैं। राजनीतिक पार्टियां प्रधानमंत्री के नाम पर वोट मांगकर आमजनता का ध्यान अपने क्षेत्र के लोकसभा उम्मीदवार की योग्यता से हटाने की कोशिश करती है। राजनीतिक पार्टियां पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया के जरिए अपने प्रधानमंत्री प्रत्याशी की एक लोकप्रिय छवि गढ़ने की कोशिश करती है; मीडिया में बार-बार अपने नेता की छवि दिखाकर इस बात का झूठा प्रचार करने की कोशिश करती है कि उनके नेता की लहर है, और आपने हमारी पार्टी को वोट नहीं दिया तो फिर आप अपना एक वोट बर्बाद कर रहे हैं।   

Tuesday, 29 April 2014

डायरी 18/4/14 : लोकतंत्र, मीडिया और बाज़ार


मीडिया विशेषज्ञ आनंद प्रधान




आज वाराणसी के लंका स्थित स्वयंवर वाटिका में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी (सेमिनार) आयोजित की गई। यह संगोष्ठी अस्मितकुंज नामक एक साहित्यिक संस्था द्वारा आयोजित की गई थी। विषय था- ’’लोकतंत्र, मीडिया और बाज़ार’’। इस संगोष्ठी में पहली बार मोहल्ला ब्लाॅग के संस्थापक अविनाश और इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ़ मास कम्यूनिकेशन (आईआईएमसी), दिल्ली के अध्यापक रहे आनंद प्रधान को पहली बार सुनने का मौका मिला। इस संगोष्ठी में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, वाराणसी में मेरे एमए के अध्यापक रहे डाॅ0 रामाज्ञा राय ने भी अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए। इन तीनों के वक्तव्य में यह बात स्पष्ट होकर उभरी कि काॅरपरोरेट घरानों ने किस तरह से मीडिया को अपने कब्जे में कर लिया है, इसके साथ वह सत्ता पर भी कब्जा ज़माने के लिए तैयार है। डाॅ रामाज्ञा राय ने अपने वक्तव्य में कहा, ’’इस देश में जो काॅरपोरेट तंत्र आया है, उसी के गर्भ से निकली हुई पत्रकारिता आज हमारे सामने है।’’
      
      डाॅ0 रामाज्ञा राय ने प्रमुख विद्वान नोम चेमस्की का हवाला देते हुए आगे कहा, ’’एक बार नोम चेमस्की ने कहा था कि पूँजीवाद का मीडिया से नाभिनाल संबंध है, मीडिया, पूँजीवाद और बाज़ार के पक्ष में प्रोपेगेण्डा तैयार करता है, छद्म किस्म के लोकतंत्र को बनाए रखने का काम करता है। 1990 के बाद खुले बाज़ार की जो नीति आई है उसमें बाघ और बकरी को एक साथ छोड़ दिया गया है। आज मीडिया के पास शक्ति है कि वह यह एजेंडा तय कर सकता है कि किस पर बात होगी और किस पर नहीं। आज देश में एक वैकल्पिक मीडिया आन्दोलन की ज़रूरत है। नागरिक पत्रकारिता के रूप में हमारे पास ब्लाॅग है, फेसबुक है, थियेटर है, पम्पलेट है। काॅरपोरेट आए फासिस्ट आए और लोकतंत्र भी बचा रहे, ऐसा नहीं होता। बनारस जैसे शहर में बुद्ध, कबीर और प्रेमचन्द ने फासिस्ट शक्तियों के प्रति प्रतिरोध दिखाया है। अगर यह शहर काॅरपोरेट फासिस्ट का शिकार हो जाता है तो यह बुद्ध, कबीर और प्रेमचन्द की हार होगी।’’
     
        अविनाश ने कहा, ’’आप जब तक उनके बाज़ार भाव को बनाये रखते हैं तब तक मीडिया मालिक आपकी सहायता करते हैं। अगर आप अलग काम करना चाहते हैं तो आपके पर कतर दिए जाते हैं।’’ अविनाश ने एक संस्मरण सुनाते हुए कहा, ’’पिछले दिनों की एक घटना है वाराणसी के कंपनी बाग में अरविन्द केजरीवाल को लोगों से बातचीत करने आना था। मैं भी वहां पहुंच गया, जब मैं वहां आया तो उस समय कुछ ही लोग वहां पर उपस्थित थे। लेकिन जिस समय अरविन्द केजरीवाल वहां आएं अचानक न जाने कहाँ से बहुत से लोग आ गए और अरविन्द केजरीवाल का विरोध करने लगे, मोदी...मोदी नारा लगाने लगे। हमने टीवी पर भी कार्यक्रम को देखा उसमें सिर्फ उसी हिस्से को दिखाया जा रहा है जिसमें लोग केजरीवाल का विरोध कर रहे हैं और मोदी मोदी चिल्ला रहे हैं। केजरीवाल के लोगों के साथ संवाद को नहीं दिखाया जा रहा। काॅरपोरेट वल्र्ड न सिर्फ मीडिया को मैनेज कर रहे हैं बल्कि पाॅलिटिक्स को भी मैनेज कर रहे हैं। इस दौड़ में बीएसपी, सपा, टीएमसी जैसी छोटी पार्टियां कहीं नज़र नहीं आ रही हैं; कहीं न कहीं सबलोग योजनबद्ध तरीके से बीजेपी के प्रति कैम्पेन करने में लगे हुए हैं।’’
     
       आनंद प्रधान ने कहा, ’’संविधान में लिखा है कि हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी है ,जो लोग प्रेस में काम करते हैं उन्हें ये भ्रम हो जाता है कि उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी है लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी आपके पास तभी हो सकती  है जब आप प्रेस के मालिक हों। आपको एक दायरे में काम करना पड़ता है। एक सीमित दायरा है जिसमें आप अभिव्यक्ति कर सकते हैं। यह दायरा भी सिकुड़ता जा रहा है। जब देश में आपातकाल लगा कई पत्रकारों ने उसका विरोध किया और उन्हें सत्ता का खौफ झेलना पड़ा। उस ज़माने की जो पत्र-पत्रिकाएं हैं उसने सवाल उठाए, लेकिन 1991 के बाद जो ग्लोबलाइजेशन शुरू हुआ उसने मीडिया के काॅरपोरेटीकरण को बढ़ावा दिया। आज हमारे यहाँ जागरण और हिन्दुस्तान जैसे अख़बारों का काॅरपोरेटीकरण हो गया है। पूँजी के आने से मीडिया का विस्तार तो हुआ, लेकिन काॅरपोरेट पूँजी जब अपना पैसा लगाती है तो उनका एक ही उद्देश्य होता है मुनाफा कमाना। उनका उद्देश्य होता है कि सीमेन्ट और स्टील जैसी कम्पनियों की तरह वे भी मुनाफा कमाएं।
     
       आनंद प्रधान ने आगे कहा, ’’आज मीडिया कम्पनियों का सरकार पर दबाव है। संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री को यह अधिकार है कि वह यह तय करे कि उसके मंत्रीमंडल में कौन मंत्री बनेगा, किन्तु नीरा राडिया के जारी टेप से यह पता चला कि कौन मंत्री बनेगा और नहीं यह सब अब काॅरपोरेट तय करने लगा है। टाटा कम्पनी चाह रही थी ए राजा कम्यूनिकेशन मिनिस्टर बने। मणिशंकर अय्यर ने जब भारत-ईरान गैस पाइपलाइन की बात की तो उन्हें हटा दिया गया। ’मोनासन्टो’ कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी है जो बीज बनाती है। भारत में बहुत सारे पर्यावरण विशेषज्ञों के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका....फिलहाल बीटी काॅटन को इसलिए लागू कर दिया गया है क्योंकि हम इसे खाते नहीं हैं। अगर आप सतर्क न रहें तो मीडिया आपको मूर्ख बनाता रहेगा। ’इंडियन एक्सप्रेस’, ’इकोनोमिक टाइम्स’, ’टाइम्स आॅफ़ इंडिया’ में इकोनोमिक रिफाॅम्र्स की बात होगी, विकास की बात होगी। यहाँ सवाल उठता है कि विकास क्या है ? और किसका विकास ? किसकी कीमत पर विकास ? यह कौन डिफाइन करेगा कि विकास क्या है ? यूपीए-प् के शासनकाल में हरियाणा में अम्बानी को 10,000 एकड़ ज़मीन दे दी गई। इस देश के अन्दर जिन्हें अपनी ज़मीन से बेदखल कर दिया गया, उनकी आबादी एक करोड़ है। जो लोग विकास के विरूद्ध में कहेंगे उनके बारे में कहा जाएगा ये विकास विरोधी हैं।’’
    
       आनंद प्रधान ने अपना एक अनुभव सुनाते हुए आगे कहा, ’’मेरे एक मित्र हैं-देवेन्द्र शर्मा, वे जीडीपी के बारे में बहुत अच्छी बात कहते हैं वे कहते हैं कि अगर आपके पास एक पेड़ है तो वह जीडीपी में सम्मिलित नहीं किया जायेगा, किन्तु अगर उसे काट दिया जाये, उसकी लकड़ी से फर्नीचर बनाकर बेच दिया जाये, तो उससे हुए लाभ को जीडीपी में सम्मिलित कर लिया जायेगा। हमें इस बात पर विचार करने की ज़रूरत है कि हमें जो भी संसाधन मिले हुए हैं क्या सबका उपभोग हमें ही कर लेना है ? एक सवाल है कि विकास का माॅडल कितनी अवधि तक टिका रहेगा ? सवाल यह भी है कि हमारे पास जो भी संसाधन हैं क्या वे सिर्फ हमारे लिए हैं ? क्या हमारे कोई संतान नहीं होंगी ? हमारे बाद कोई नई पीढ़ी आएगी या नहीं ? सवाल यह भी है कि क्या हम सब सिर्फ कंज्यूमर हैं ? यह मीडिया हमें सिर्फ कंज्यूमर बनाता है, लेकिन हम नागरिक भी हैं। सबसे पहले हम एक नागरिक हैं, कंज्यूमर बाद में हैं। अगर आप नागरिक होंगे तो आपको देश की चिन्ता होगी।’’
    
       आनंद प्रधान ने वरिष्ठ पत्रकार पी0 र्साइंनाथ का हवाला देते हुए कहा, ’’हमारे मास मीडिया का वास्तविक यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है। इसने यह फैलाया दिया है कि जो भी विकास के विरोध की बात करेगा वह विकासविरोधी और देशद्रोही है। आनंद प्रधान ने आगे कहा, ’’वैकल्पिक पत्रकारिता की आज सबसे ज्यादा ज़रूरत है। काॅरपोरेट ने मीडिया और सत्ता के साथ जो लाॅबी बनाई है उसके लिए एक वैकल्पिक राजनीति और वैकल्पिक मीडिया की ज़रूरत है। कई बार यह भ्रम पैदा कर दिया जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का चैथा खम्भा है, जबकि पूँजीवादी लोकतंत्र में मीडिया काॅरपोरेट के हाथ की कठपुतली है। आज के समय में ’मीडिया लिटरेसी’ पैदा करने की ज़रूरत है। किसी भी न्यूज़ को संदेह की दृष्टि से आलोचनात्मक दृष्टि से देखने की ज़रूरत है। हमें स्कूलों में भी मीडिया के बारे में पढ़ाने की ज़रूरत है। आलोचनात्मक दृष्टि रखने वाला पाठक पैदा करने की ज़रूरत है।’’

Friday, 25 April 2014

डायरी 16/4/14 : लोकसभा चुनाव 2014 के बारे में वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार से सवाल जवाब

रवीश कुमार के साथ प्रमोद कुमार बर्णवाल



        आज जब मैं अपने हिन्दी विभाग, बीएचयू, वाराणसी पहुंचा तो पता चला कि एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार वहां आए हुए हैं। इधर जब से 16 वीं लोकसभा चुनाव के विभिन्न चरणों की शुरूआत हुई है विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों के पत्रकार चुनाव से संबंधित समाचार प्रकाशित प्रसारित करने में लगे हुए हैं। एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार भी विभिन्न शहरों और गाँवों में जा रहे हैं और चुनाव के बारे में लोगों के विचार जानने का प्रयास कर रहे हैं, इसी क्रम में वे बीएचयू, वाराणसी आए हुए थे। 
 
          मैं जब तक विभाग के गेट पर पहुंचा विभिन्न छात्र छात्राएं तथा प्रोफेसर रवीश कुमार के सामने अपने विचार रख चुके थे। कैमरा आॅफ़ हो चुका था, और विभिन्न छात्र छात्राएं रवीश कुमार के साथ फोटो खिंचवाने में लगे हुए थे। हिन्दी विभाग के ही एक प्रोफेसर रामाज्ञा राय ने रवीश कुमार को चाय का आॅफर दिया।
       
            रवीश कुमार, रामाज्ञा राय और विभिन्न छात्र छात्राएं चाय के लिए मैत्री जलपान गृह की ओर बढ़े। मेरे मन में आया कि इन दिनों रवीश कुमार चुनाव के बारे में लोगों के विचार जानने के लिए जगह-जगह की यात्रा कर रहे हैं, तो फिर क्यों न लोकसभा चुनाव के बारे में उनके विचार जाना जाये। विभिन्न जगहों की यात्रा के बाद उन्हें क्या अनुभव हुआ है, इस बारे में उनसे पूछा जाये-- यहीसब सोचकर मैंने भी अपने कदम मैत्री जलपान गृह की ओर बढ़ा दिये।
    
          मैंने सोचा था कि रवीश कुमार से कुछ सवाल जवाब करूंगा लेकिन इसकी आवश्यकता महसूस नहीं हुई क्योंकि विभिन्न छात्र रवीश कुमार से बहुतकुछ जानने के लिए उत्सुक थे। कटलेट के स्वाद और चाय की चुस्कियों के बीच छात्रों ने एक के बाद एक उनसे कई सवाल पूछे, और रवीश कुमार ने भी उनका विनम्रता पूर्वक जवाब दिया। इन सवालों में मेरे भी सवाल छिपे हुए थे, अतः मुझे कुछ भी पूछने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। छात्रों ने जो सवाल किये और रवीश कुमार ने जो जवाब दिये, उनके ही भाव संक्षेप में यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ --
      
          एक छात्र ने रवीश कुमार से पूछा कि सर आप इतनी जगहों पर जा रहे हैं, मीडिया में बार बार आ रहा है कि नरेन्द्र मोदी की लहर है, आप इस बारे में क्या सोचते हैं ? क्या आपको विभिन्न जगहों पर नरेन्द्र मोदी की लहर दिखी ? इसके जवाब में रवीश कुमार ने कहा, ’’दरअसल लोग विभिन्न राजनीतिक दलों से खफा हैं। ’कास्ट एलाइन्स’ टूटा है, और इसीलिए लोगों का झुकाव नरेन्द्र मोदी की तरफ हुआ है।’’  
     
         एक छात्र ने उनसे सवाल किया कि सर हमें अपना वोट किसे देना चाहिए ? क्या हमें यह सोचकर वोट देना चाहिए कि हमारा वोट प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को जा रहा है ? इस पर रवीश कुमार ने कहा, ’’विभिन्न राजनीतिक पार्टियां एक कैम्पेन करने में लगी रहती हैं, ताकि जनता अपने उम्मीदवार की योग्यता अयोग्यता को नज़रअंदाज़ करके वोट दें। सभी को चाहिए कि  वे अपने लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवार को देखकर वोट दें। वैसे भी संविधान के अनुसार ये चुनाव 16वीं लोकसभा के गठन के लिए हो रहे हैं न कि प्रधानमंत्री के चुनाव के लिए, जनता को अधिकार और कर्तव्य है कि  वह अपना प्रतिनिधि चुनकर लोकसभा में भेजें, कौन प्रधानमंत्री बनता है या नहीं बनता है यह उसके विचार-क्षेत्र में नहीं है। इसे इस तरह से समझिये कि आप छात्र हैं, आप किसी क्लास में पढ़ रहे हैं, आपका एक सिलेबस है, आपकी चिन्ता अपने सिलेबस को पूरा करने की होनी चाहिए।’’
     
            एक छात्र ने सवाल किया कि लेकिन सर, अगर किसी नेता को अपने क्षेत्र में चुनते हैं और उसकी पार्टी को बहुमत नहीं आता है, तब तो फिर से चुनाव होंगे, खर्च बढे़गा। इस पर रवीश कुमार ने उसी छात्र से सवाल किया, ’’आपका पैसा खर्च होगा ? देखिये खर्च सरकार का होगा, आपको इसकी फिक्र करने की ज़रूरत नहीं है। और यह अच्छा ही है न पार्टियां प्रचार में इतना पैसा खर्च करती हैं जल्दी जल्दी चुनाव हुआ तो हुआ तो जनता भी देखेगी कि उनके पास कितना पैसा है।
     
           एक छात्र ने सवाल किया, ’’सर, ’आप’ पार्टी ने दिल्ली में जो इस्तीफा दिया, वह ठीक किया या नहीं ?’’ इस पर रवीश कुमार ने कहा, ’’अरविन्द केजरिवाल ने अम्बानी और मीडिया पर सवाल नहीं उठाया होता तो वे अभी भी सत्ता में होते, लेकिन ठीक ही है कि उन्होंने उनपर सवाल उठाया, आखिर कौन उठायेगा, किसी को तो उठाना चाहिए। एक छात्र ने कहा, ’’पिछले साठ वर्षों में देश की राजनीति में कुछ भी बदलाव नहीं हुए हैं.....।’’ रवीश कुमार ने बीच में ही उस छात्र को टोका, ’’नहीं, ऐसा नहीं कह सकते हैं, बदलाव हुए हैं। लेकिन राजनीति में एक बड़े बदलाव के लिए कम से कम बीस वर्ष चाहिए। बीस वर्ष तक किसी को लगना पडे़गा।’’ इस पर उस छात्र ने कहा, ’’सर, आप क्या सोचते हैं कि अरविन्द केजरीवाल अपना बीस वर्ष राजनीति के लिए देंगे ? इस पर रवीश कुमार ने जवाब दिया, ’’सवाल यह नहीं है कि अरविन्द केजरिवाल राजनीति को बीस वर्ष देंगे या नहीं, सवाल यह है कि क्या आप उनका साथ देंगे ?’’

Tuesday, 15 April 2014

डायरी 18/12/13 राजनयिक बनाम नौकरानी





आज दिनांक 18-12-13 के हिन्दुस्तान अख़बार में एक संपादकीय टिप्पणी छपी है - राजनयिक का अपमान। इसके अन्तर्गत अमेरिकी सरकार द्वारा भारतीय राजनयिक के अपमान पर क्षोभ प्रकट किया गया है। एक तरह से तो यह ठीक जान पड़ता है। किन्तु मैं यहाँ एक बात जोड़ना चाहता हूँ:  न्यूयार्क में भारत की देवयानी खोबरागड़े के खिलाफ यह आरोप लगाया गया है कि  वे अपने नौकर को न्यूनतम मजदूरी से कम वेतन देती हैं। इसके अलावा अपनी नौकरानी के लिए अमेरिकी वीज़ा हासिल करने के लिए जो नियम है उसका देवयानी ने पालन नहीं किया है। भारत सरकार और मीडिया अमेरिकी प्रशासन का विरोध कर रही है किन्तु उस नौकरानी की बात कोई नहीं कर रहा। इस बात की भी जाँच करने की ज़रूरत है कि क्या नौकरानी को आवश्यक मजदूरी दी जा रही थी ? आखि़र उस नौकरानी के भी तो कुछ मानवाधिकार हैं, क्या भारतीय राजनयिक द्वारा उसके मानवाधिकार पर ध्यान दिया जा रहा था या नहीं

        

प्रमोद कुमार बर्णवाल